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मेळघाट के चरवाहे की 'रॉयल' छलांग: कल तक चराता था बकरियां, अब 55 लाख की स्कॉलरशिप पाकर पढ़ाई के लिए जाएगा ब्रिटेन!


-अरुण जोशी

अमरावती: विदर्भ के दुर्गम और आदिवासी बहुल क्षेत्र मेलघाट के एक छोटे से गांव 'चिलाटी' से निकलकर एक युवक ने सात समंदर पार ब्रिटेन तक का सफर तय कर इतिहास रच दिया है। किशोर लखाजी बेठेकर नाम के इस आदिवासी युवक ने अपनी गरीबी और विपरीत परिस्थितियों को मात देते हुए 55 लाख रुपये की विदेशी शिक्षा छात्रवृत्ति (Scholarship) हासिल की है।

बकरियां चराते हुए देखा था बड़ा सपना
किशोर की यह सफलता किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। एक बेहद साधारण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में जन्मे किशोर का बचपन अभावों में बीता। घर चलाने के लिए उन्हें बचपन में गाय-बकरियां चराने का काम करना पड़ता था। लेकिन उनके भीतर सीखने की ललक इतनी तेज थी कि वे बकरियां चराते समय भी पेड़ों की छांव में बैठकर अपनी किताबें पढ़ा करते थे।

भाषा और सुविधाओं की दीवार को लांघा
कोरकू आदिवासी समुदाय से आने वाले किशोर के लिए शिक्षा की राह में सबसे बड़ी बाधा भाषा थी। अपनी स्थानीय बोली से निकलकर मराठी और फिर अंग्रेजी माध्यम में खुद को ढालना उनके लिए बड़ी चुनौती थी। शुरुआत में किशोर ने आश्रमशाला से प्राथमिक शिक्षा पूरी की। बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में भी पढ़ाई जारी रखी। अपने समाज के लिए कुछ करने के जज्बे ने उन्हें बड़े शहर और फिर विदेश जाने की प्रेरणा दी।

55 लाख की छात्रवृत्ति और ब्रिटेन का सफर
किशोर ने अपनी शैक्षणिक योग्यता के दम पर ब्रिटेन के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में प्रवेश सुरक्षित किया है। महाराष्ट्र सरकार द्वारा दी गई 55 लाख रुपये की छात्रवृत्ति से उनके रहने और पढ़ाई का पूरा खर्च वहन होगा। उनके पिता ने इस भावुक पल पर कहा कि उन्हें अपने बेटे पर गर्व है जिसने गरीबी को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।

मेलघाट के युवाओं के लिए बने रोल मॉडल
मेलघाट जैसे क्षेत्र, जो अक्सर कुपोषण और पिछड़ेपन की खबरों के लिए चर्चा में रहते हैं, वहां से किशोर की यह कामयाबी एक नई उम्मीद लेकर आई है। किशोर बेठेकर अब उन हजारों आदिवासी छात्रों के लिए प्रेरणा बन गए हैं जो संसाधनों की कमी के कारण बड़े सपने देखने से डरते हैं।