भंडारा के युवा किसान का कमाल: 'देसी जुगाड़' से बनाई बायोगैस, अब ट्रैक्टर की ट्यूब से जल रहा है चूल्हा
भंडारा: आसमान छूती महंगाई और गैस सिलेंडर की किल्लत के बीच, महाराष्ट्र के भंडारा ज़िले के एक युवा किसान ने आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख दी है। लखांदूर तालुका के पहुंगांव निवासी जितेंद्र हरिदास अथोले (35) ने अपनी सूझबूझ से एक ऐसा बायोगैस सिस्टम तैयार किया है, जिसने गैस एजेंसियों की निर्भरता को खत्म कर दिया है।
महंगी तकनीक नहीं, 'देसी जुगाड़' पर भरोसा
जहाँ बायोगैस प्लांट लगाने में हज़ारों का खर्च आता है, वहीं जितेंद्र ने इसे घर में पड़ी बेकार चीज़ों से तैयार किया है। उन्होंने इस प्रोजेक्ट के लिए किसी बाहरी इंजीनियर की मदद नहीं ली।
कैसे काम करता है 'अथोल पैटर्न'?
- प्लास्टिक टंकी का उपयोग: जितेंद्र ने 500 लीटर की एक पुरानी पानी की टंकी को 'डाइजेस्टर' बनाया, जिसमें गोबर और पानी का मिश्रण डाला जाता है।
- गैस स्टोरेज के लिए ट्रैक्टर की ट्यूब: सबसे बड़ी चुनौती गैस को स्टोर करने की थी। जितेंद्र ने एक अनोखा रास्ता निकाला—उन्होंने टंकी से निकलने वाले पाइप को ट्रैक्टर की रबर ट्यूब से जोड़ दिया।
- नीली लौ के साथ कुकिंग: जैसे ही टंकी में गैस बनती है, वह ट्यूब में भर जाती है। ज़रूरत पड़ने पर इसी ट्यूब से जुड़ी पाइप लाइन रसोई के बर्नर तक गैस पहुँचाती है, जिससे तेज़ नीली लौ जलती है।
धुएं से मुक्ति और सेहत की सुरक्षा
वर्तमान में गैस के दाम बढ़ने के कारण ग्रामीण इलाकों की महिलाओं को लकड़ी इकट्ठा करने जंगल जाना पड़ता है, जिससे निकलने वाला धुआं सेहत के लिए हानिकारक है। जितेंद्र का यह इको-फ्रेंडली तरीका न केवल सस्ता है, बल्कि प्रदूषण मुक्त भी है।
जितेंद्र हरिदास अथोले ने कहा,"सिलेंडर की बढ़ती कीमतों और समय पर डिलीवरी न मिलने से मैं परेशान था। मैंने अपनी पानी की टंकी और एक पुरानी ट्यूब का इस्तेमाल किया। आज मेरा पूरा परिवार इसी पर खाना बना रहा है। यदि अन्य किसान भी इसे अपनाएं, तो वे अपना ईंधन का खर्च पूरी तरह बचा सकते हैं।"
इलाके में 'अथोल पैटर्न' की धूम
जितेंद्र की इस सफलता के बाद पहुंगांव ही नहीं, बल्कि आसपास के गांवों के लोग भी उनके घर इस बायोगैस प्लांट को देखने पहुँच रहे हैं। युवाओं के लिए जितेंद्र एक प्रेरणा बन गए हैं, जिन्होंने साबित कर दिया कि "इच्छाशक्ति हो तो संसाधनों की कमी कभी आड़े नहीं आती।"
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