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मध्य प्रदेश में सरकार बनाने और बिगाड़ने में अहम भूमिका निभाएगा तीसरा दल


-अतुल मलिकराम

 

इस साल नवंबर दिसंबर में तीन प्रमुख हिंदी भाषी राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, और राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनाव आयोग की तारीखों में अभी भले वक्त हो लेकिन राजनीतिक दलों ने अपने-अपने स्तर पर कमर कसना शुरू कर दी है। 120 लोकसभा वाले इन तीन राज्यों में से फिलहाल दो पर कांग्रेस का कब्ज़ा है, और मध्य प्रदेश में शिवराज संभवता अपने अंतिम कार्यकाल को सफलतापूर्वक पूरा करने में लगे हुए हैं। ऐसे में इस साल होने वाले चुनावों में, सीटों के मामले में सबसे बड़ा राज्य होने के नाते असली जंग व संघर्ष, मध्य प्रदेश में ही देखने को मिलेगा। 

 

एमसीडी चुनाव और हिमाचल प्रदेश में मिली करारी शिकस्त के बाद, बीजेपी घायल शेर की तरह इन राज्यों पर नजर गड़ाए हुई है। चूंकि 23 के बाद 2024 में भी आम चुनाव लगे हुए हैं, लिहाजा 29 लोकसभा सीटों वाले मध्य प्रदेश में भाजपा आलाकमान, 23 विधानसभा चुनाव में भी सत्ता में बने रहने का भरसक प्रयास करेगा। पार्टी के रणनीतिकार ये बिलकुल नहीं चाहेंगे कि 24 में मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने में कोई भी, खासकर हिंदी भाषी राज्य खलल पैदा करें। ऐसे में उसे अपने पुराने साथियों को साथ लाना पड़े, या नए मित्रों को करीबी मित्र बनाना पड़े, पार्टी अपने लिए सभी रास्ते खोलकर रखना चाहेगी। 

 

दूसरी तरफ यूपी सरकार में बीजेपी के साथ गठबंधन में बंधी अपना दल (एस), मध्य प्रदेश में अपनी सियासी जमीन तलाशने में जुट गई है। मध्य प्रदेश में पहले से अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहीं, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी के बीच अपना दल (एस) के लिए, परिस्थितियां लगातार अनुकूल बनी हुई हैं। चूंकि बीजेपी यहां भी अनुप्रिया पटेल की पार्टी के साथ गठबंधन का सहारा लेती है तो उसके लिए, तीसरे दल से लड़ने का खतरा थोड़ा कम हो जाएगा, और फिर यदि गठबंधन में बात नहीं भी बनती है तो, मध्य प्रदेश के ऐसे इलाके जो कुर्मी बाहुल हैं, और पाटीदार या पटेल समाज के अंतर्गत आते हैं, वहां अपना दल (एस), अपना सियासी अस्तित्व न रखते हुए भी अच्छी पकड़ रखती है। 

 

जबकि ग्वालियर चम्बल का इलाका जो विगत चुनाव में कांग्रेस के लिए सत्ता की चाभी सिद्ध हुआ था, वहाँ इस बार सपा बसपा के साथ अपना दल (एस) की गतिविधि भी दिखने लगी है। वहीं तीसरे दल के रूप में आम आदमी पार्टी भी हुंकार भरने को तैयार है। सिंगरौली में महापौर की जीत के साथ मध्य प्रदेश में अपना खाता खोल चुकी आप, तीसरे दल के रूप में सबसे ऊपर रहने का प्रयास करेगी। यहां तक कि ओवैसी की पार्टी ने भी मध्यप्रदेश में उन इलाकों में अपनी सक्रियता बढ़ाने की तैयारी कर ली है जहां उनको जीत की आस है। 

 

कुल मिलाकर देखें तो इस साल होने वाले 9 राज्यों के विधानसभा चुनाव में मध्य प्रदेश की जंग सबसे रोचक और ऐतिहासिक होने वाली है। मैं अभी तक के समीकरणों के आधार पर कह सकता हूँ कि यदि भाजपा या कांग्रेस, सहयोगियों को नजरअंदाज करती है तो तीसरा दल पर खेल रहे खिलाड़ी, उसका खेल बिगाड़ने में पूरा सहयोग करेंगे। इसी लिहाज से देखें तो आगामी चुनावों में कांग्रेस 80 से 95 के बीच, बीजेपी 95 से 110 के बीच, जबकि तीसरा दल व अन्य 20 से 30 सीटों के बीच में बने रह सकते हैं। 

 

वहीं तीसरे दल के रूप में सपा-बसपा की जोड़ी को पीछे छोड़कर अपना दल (एस) और आम आदमी पार्टी एवं अन्य छोटे दल, उभरकर सामने आ सकते हैं। अब ये देखना वाकई काफी दिलचस्प होगा कि क्या भाजपा अकेले दम पर मध्य प्रदेश की सत्ता में वापसी कर के एक नया इतिहास लिखती है या सहयोगियों और गठबंधन का सहारा लेती है, या फिर तीसरे दल के साथ मिलकर कांग्रेस कोई चाल चलने में कामयाब हो जाती है और सबसे महत्वपूर्ण, कांग्रेस-बीजेपी जैसे दिग्गजों का सरकार गठन में तीसरा दल अपनी कितनी भूमिका निभाता है!