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Nagpur

भाषा का चूर्ण और अस्मिता का अफीम: जनता को बहलाने का नया हथकंडा


-रवि शुक्ला 

सालों तक सत्ता के सिंहासन पर जमें रहो। सुविधाएं उठाओ, सरकारी तंत्र को अपने इशारों पर नचाओ, और जब चुनाव की दस्तक सुनाई दे, जब जनता से हिसाब देने की घड़ी आए तो मुद्दों से ध्यान भटकाने का सबसे आसान तरीका अपनाओ: भाषा और अस्मिता का चूर्ण फेंक दो भीड़ में।

इस वक्त देश के तीन प्रमुख राज्यों में यही खेल खेला जा रहा है। सालों के शासन के बाद जब जनता पूछने लगी, “बताइए साहब, आपने क्या किया? कितने उद्योग आए? कितनों को रोज़गार मिला? अपराध कम हुए या नहीं? महिलाएं आज भी डरी-सहमी क्यों हैं? दंगे क्यों हुए? पलायन क्यों थमा नहीं?”  तब जवाब में तर्क नहीं मिले तो तू-तू मैं-मैं की स्क्रिप्ट निकाल ली गई।

नेताओं ने तय कर लिया कि जनता को मुद्दों में उलझाओ मत, उन्हें अस्मिता के नाम पर भिड़ाओ।भाषा को हथियार बना दो, संस्कृति को कवच बना दो और विकास के सवालों से सारा ध्यान हटा दो।

कितनी विडंबना है कि जिस देश में एआई, तकनीक, और वैश्विक संवाद की बात हो रही है, वहां कुछ सियासी कलाकार भाषा की बांसुरी बजा कर जनता को जादू में बांध रहे हैं। और ये जनता? बिना सोचे-समझे, भरी दोपहरी में भी दीया लेकर उनके पीछे चल देती है — अपने ही घर, दुकान, और मोहल्ले को आग में झोंकती हुई।

भाषा, जो जोड़ने का माध्यम है, उसे तोड़ने का औज़ार बना दिया गया है। राजनीति की रसोई में आजकल ‘भाषा की बिरयानी’ पक रही है लेकिन इसमें मुद्दों का नमक नहीं है, सिर्फ़ अफवाहों की मिर्च है।

भूलिए मत भाषा जानने वाला व्यक्ति सीमाओं को लांघता है, संकीर्णता को पछाड़ता है और नए अवसरों को पकड़ता है। भाषा ज्ञान आपको किसी एक कोने में नहीं, बल्कि पूरे विश्व में पहचान दिला सकता है। लेकिन जब किसी राज्य में बाहरी व्यक्ति को सिर्फ़ इसलिए नकार दिया जाए कि वो उस भाषा में पारंगत नहीं है — तो यह विकास का नहीं, संकुचित मानसिकता का प्रमाण है।

जो भी राज्य में रहता है, उसे वहां की भाषा और संस्कृति का सम्मान करना चाहिए — इसमें कोई दो राय नहीं।

लेकिन जब भाषा का इस्तेमाल किसी समुदाय को नीचा दिखाने, उन्हें डराने, धमकाने या खदेड़ने के लिए किया जाए — तो यह न सिर्फ संविधान के खिलाफ है, बल्कि इंसानियत के भी खिलाफ है।

असली सवाल अब जनता से है

अब फैसला उस जनता को करना है, जो हर चुनाव से पहले भावनाओं की भट्टी में झोंकी जाती है। जो हर बार नेताओं की भाषाई तुकबंदी से बहक जाती है, जो कभी धर्म के नाम पर, तो कभी अस्मिता के नाम पर एक-दूसरे की गर्दन तक पकड़ लेती है।

लेकिन फिर पांच साल तक पानी, बिजली, सड़क और नौकरी के लिए तरसती रहती है। सवाल ये है कि क्या जनता इस बार भी वही पुराना चूर्ण फांककर फिर से ठगी जाएगी? या अब वो अपनी आंखें खोलेगी, भाषणों के शोर से निकलकर असल मुद्दों की आवाज़ सुनेगी?


नेताओं की जुबान पर जितनी तेजी से भाषा आती है, उतनी ही तेजी से जवाबदेही क्यों नहीं आती? क्या अब भी भाषा की आंधी में उड़कर वोट पेटियों में भरोसा भेजेंगे,

या इस बार मुद्दों की कसौटी पर नेता को तौलेंगे?जनता को अब यह तय करना है कि वो भाषा के नाम पर सीमित होना चाहती है या विवेक के रास्ते वैश्विक होना चाहती है।

क्योंकि इस बार अगर आप चूके, तो अगली बार फिर कोई आएगा नया चूर्ण लेकर, नया अफीम लेकर और आप फिर से उसी भीड़ में होंगे, जो नारे लगाती है… पर सवाल नहीं पूछती।