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Chandrapur

चंद्रपुर जिले में ‘पांच-तीन-दो’ के खेल में अधिकारी परेशान, किसकी सुनें और किसकी नहीं


- पवन झबाडे

चंद्रपुर: राज्य में महायुति सरकार बने तीन महीने हो चुके हैं, लेकिन अब तक प्रशासनिक फेरबदल नहीं हुआ है। जिले में सत्तारूढ़ दल के विधायकों ने अपनी पसंद के अधिकारियों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाने के लिए लॉबिंग शुरू कर दी है। इस स्थिति ने पालकमंत्री डॉ. अशोक उईके को मुश्किल में डाल दिया है, जबकि वरिष्ठ अधिकारियों के लिए यह तय करना कठिन हो गया है कि वे किसकी सुनें।

दो दशक बाद पहली बार चंद्रपुर जिले का पालकमंत्री पद बाहरी व्यक्ति को मिला है। यवतमाल जिले के रालेगांव विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले आदिवासी विकास मंत्री अशोक उईके को चंद्रपुर जिले की जिम्मेदारी दी गई है। लेकिन भाजपा में आंतरिक खींचतान के कारण जिले में गुटबाजी चरम पर है।

भाजपा के वरिष्ठ नेता सुधीर मुनगंटीवार और राजुरा के विधायक देवराव भोंगले एक तरफ हैं, जबकि चंद्रपुर के विधायक किशोर जोरगेवार, चिमूर के विधायक बंटी भांगडिया, वरोरा के विधायक करण देवतले और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष हंसराज अहीर दूसरी तरफ हैं। इसके अलावा, पूर्व विधायक शोभाताई फडणवीस भी अब सक्रिय हो गई हैं और मुनगंटीवार विरोधी खेमे में शामिल हैं। 

कभी "100% भाजपा" होने का दावा करने वाला यह जिला अब "2 बनाम 5" के गुटों में बंट चुका है। इस गुटबाजी के बीच पालकमंत्री को सभी को साथ लेकर चलना चुनौतीपूर्ण हो रहा है। सत्ता में आने के बाद विधायक चाहते हैं कि उनके समर्थक अधिकारियों को प्रमुख पदों पर नियुक्त किया जाए। यदि पालकमंत्री जिले से होते, तो बदलाव में उनका ही आदेश अंतिम होता। लेकिन चूंकि वे बाहरी जिले से हैं, इसलिए भाजपा के कई विधायक उनके जरिए अपनी पसंद के लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर बिठाने की कोशिश कर रहे हैं।

इस गुटबाजी का सीधा असर प्रशासनिक अधिकारियों पर पड़ रहा है। एक ही कार्य के लिए उन्हें दो-तीन विधायकों के फोन आते हैं - कोई काम करने को कहता है, दूसरा उसे रोकने को कहता है, और तीसरा कोई और सुझाव देता है। इस "कुर्सी" के खेल से वरिष्ठ अधिकारी परेशान हैं। उनके अधीनस्थ अधिकारियों के तबादलों के लिए दबाव डाला जा रहा है।

महायुति सरकार बने तीन महीने हो चुके हैं, और जल्द ही प्रशासनिक फेरबदल होगा। इस फेरबदल में अपनी पसंद के अधिकारियों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाने के लिए सत्तारूढ़ दल के विधायक पूरा जोर लगा रहे हैं। ऐसे में पालकमंत्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे इस गुटबाजी को कैसे संभालें।