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Nagpur

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने पेटेंट पर कहा, ज्ञान के पेटेंट की आखिर क्या है आवश्यकता ?


नागपुर:राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत ने कहा कि नई शिक्षा नीति बन जाने के बाद उसकी समीक्षा की जाएगी, नई शिक्षा नीति का सिलेबस बन रहा है उसमें कई बातें जो पहले नहीं आई है,छठी क्लास तक की शिक्षा नीति बन गई है, उसमे कई बातें आई है जो पहले नहीं थी, आगे भी आएगी ऐसी आशा करेंगे, पहले आने दो फिर उसकी समीक्षा करेंगे,अपने ज्ञान की परंपरा में जो ठीक है विशेषकर जो आपकी दुनिया को भी मार्गदर्शन करें वह आना ही चाहिए, उसे ज्ञान भी बढ़ता, स्वाभिमान भी बढ़ता है, नई शिक्षा नीति बन जाने के बाद उसकी समीक्षा की जाएगी,

दुनिया के हर विषय में अन्वेषण के हमारे पास हमारे पूर्वजों का  किया हुआ कुछ ना कुछ है, वो परंपरा से चलते आया, पहले हमारी यहां ग्रंथ नहीं थे, मौखिक परंपरा से चला, बाद में ग्रंथ हुए ,वह ग्रंथ  इधर से उधर चले गए, बाद में स्वार्थी लोग घुस गए, उन्होंने ग्रंथ मैं कुछ कुछ घुसा दिया जो बिल्कुल गलत है, उस ग्रंथों की, उन परंपरा के ज्ञान की फिर एक बार समीक्षा आवश्यक है, समीक्षा के बाद जो इस कसौटी पर टिकेगा वह विज्ञान है और धर्म है दौनो, विज्ञान है और लाभकारी ज्ञान है उसे मनु जाति का लाभ हो सकता है उसके लिए आवश्यक है अनुशासन है, उस अनुशासन से विज्ञान को लोगों के सामने लाना पड़ेगा,

मोहन भागवत ने कहा कि ज्ञान का पेटेंट की क्या आवश्यकता है ,मोहन भागवत ने कहा कि हमारे पास भी साइंटिफिक दृष्टि थी ,उसके आधार पर हम चले, हमारी व्यवस्था है तहसन हो गई सारी ,हमारी ज्ञान की परंपरा खंडित हो गई है, आक्रमण के कारण, आक्रमणों के कारण हम काफी अस्थिर हो गए, हम अपने आक्रमण को पक्का करने के लिए इसकी स्मृति भी हमारे मन से विदेशी शासकों ने मिटा दी, इसलिए आज की हालत है ,हम यदि आद करें, हम यदि अन्वेषण करें, हमारे पास और क्या-क्या है, आज वह कितना उपयुक्त है, कई दुनिया के सामने की समस्याएं उनके पास दूसरा हल नहीं है, वह हमारे पास है, दूनिया अधिकारवादी है, इसलिए वो हम तक ये बात आने नहीं देती है, ऐसी ताकते है, कुछ हमारे पास है पहले से ,उसे हम भूले नहीं थे, उसको भी एप्रोपीयोट जैसे योग है, सारी दुनिया में गूंज रहा है, लेकिन कुछ लोग अब कह रहे हैं ,योग यानी क्या अलग बात है, अथवा योग का जन्म हमारे यहां हुआ है, योग के लिए भी पेटेंट एप्लीकेशन दूसरे देश के हुआ था, ये पेटेंट क्या जंजाल है ,ज्ञान पर किसी का अधिकार होता है क्या, ज्ञान तो जिज्ञासु को देने के लिए होता है, जिज्ञासु और ठीक बुद्धि वालों को ज्ञान देना, गलत आदमी को ज्ञान नहीं देना, रक्षकों को ज्ञान नहीं देना, लेकिन सज्जनों में जो जानना चाहते हैं ,सज्जनों के जानने से दुनिया को उसका उपयोग है, वह ज्ञान देना ही देना उसका पेटेंट क्या होता है, किस ने क्या खोजा, जितना उपयुक्त सब के पास पहुंचे,

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि हमारे पूर्वजों का लंबा जीवन है, हम दुनिया के सबसे प्राचीन देश है ,आज की गणना ,जो नए सबूत आए हैं ,उसके आधार पर हमारे समाज की, हमारी देश की आयु 12000 साल वर्ष पहले की है, देस यानी हमारे समाज जीवन की आयु 12000 साल तक लेकर जाता है, अपनी गणन देखेंगे तो कलयुग की 5124 हुये है उसके पहले 3 युग बीत चुके हैं, इतनी लंबी आयु है ,इसके पीछे क्या है, हमारे लोगों ने खोजा ,खोजा तो कहां रिकॉर्ड है, लेब्रॉटी कहां थी ,लोग पूछते हैं ,क्या यही एक रास्ता है विज्ञानिक मैं रास्ता है वह प्रत्यक्ष है,

आर एस एस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि हमारी परंपरा कहती हम सबसे प्राचीन हैं, दुनिया बाहर की बातों को देखते देख कर रुक गई ,हम वहां रुके नहीं  हम और अंदर झांक  अंदर की बातें खोज कर निकाली, यह तो पक्का है, सिद्ध है, पूर्वजों ने हमारे इन साधनों का उपयोग करके कुछ बातें देखी होगी, यह जो कहा धर्म और विज्ञान इनके साथ चलना चाहिए, यह साथ चल भी सकते हैं, क्योंकि दोनों आजकल जो हम साइंटिफिक इंक्वायरी कहते हैं,वैसी साइंटिफिक इंक्वायरी है, हमारे यहां सारी बातें आस्तीत्व के सत्य से जुड़ी है, जो चैतन्य मे है ऐसा हम मानते हैं, इसलिए हम भूमि की पूजा करते हैं, पेड़ों को भी पूजा करते हैं, ग्रहों को भी पूजा करते, सर्वत्र चेतन्य यह मानते हैं, इसलिए उस में पवित्रता है ,उसकी पूजा करना तो सामान्य व्यक्ति को एक तरीका दिया है पूजा का, हल्दी ,कुमकुम और फूल चढावो, जब हम धर्म और वेदों की बात करते हैं तो लगता है कि पूजा, बाती की, है लेकिन वह पूजा बाती नहीं है वह, विज्ञान तरीका अलग है हमारा तरीका इनट्यूशन का है, विज्ञान का तरीका एक्सपेरिमेंट का है, लेकिन इनटीयुशन के तरीके में भी हमें यह बताया है कि विश्वास मत रखो ,हमारी सारी परंपरा में, धर्म के परंपरा में, संप्रदाय के परंपरा में, फेथ  ऐसा शब्द नहीं है ,बिलीभ ऐसा शब्द नहीं है, हमारे यहां शब्द है प्रतीति , अनुभव,

बृहस्पति मंदिर है, शनि मंदिर है ,यह कहने के बाद ,आधे लोग कहते हैं पूजा वगैरह है, उसे तो कोई अपना विश्वास नहीं , संकट में पड़ते हैं तो नारियल फोड़ते हैं, विश्वास भी सही नहीं होता, वह अविश्वास भी सही नहीं होता, एक वीच की स्थिति में अधिकांश लोग लटकते रहते हैं, इसके पीछे तर्क क्या है लोगों को मालूम नहीं रहता, अनुभव क्या है मालूम नहीं रहता, मालूम होने के बाद किसी को बतावे तो विश्वास नहीं होता, क्योंकि आज के दिनों में एक तर्क पर दूसरा वितर्क आ जाता है, यह वातावरण में काफी बढा है,