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Chandrapur

Chandrapur: सुप्रीम कोर्ट के फैसले से स्थानीय स्वराज संस्था के संभावित उम्मीदवारों के होली पर पानी


(पवन झबाडे)

नागपुर: ओबीसी आरक्षण और प्रभाग रचना से जुड़ी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई 6 मई तक टल गई है। चुनावी प्रक्रिया पूरी करने में लगने वाले समय को देखते हुए अब नगरपालिका और जिला परिषद चुनाव दिवाली तक टलने की संभावना जताई जा रही है। इस फैसले से चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे संभावित उम्मीदवारों की उम्मीदों पर पानी फिर गया है।

चंद्रपुर जिला परिषद, महानगर पालिका, नगर पालिका और नगर पंचायतों में पिछले तीन वर्षों से प्रशासक नियुक्त हैं। चुनाव की संभावना को देखते हुए कई उम्मीदवारों ने पहले ही अपनी तैयारी शुरू कर दी थी। उन्होंने मतदाताओं से संपर्क बढ़ाया, प्रचार सामग्री पर खर्च किया और नेताओं की मर्जी के मुताबिक भाग-दौड़ भी की। लेकिन जब राज्य में 97 नगर पालिकाओं के चुनाव की अधिसूचना जारी हुई, तब उसमें ओबीसी आरक्षण शामिल नहीं था। इसके बाद, ओबीसी आरक्षण को पूर्वलक्षी प्रभाव से लागू करने और प्रभाग रचना में बदलाव की मांग को लेकर कई याचिकाएं दायर की गईं। परंतु ठोस निर्णय आने के बजाय मामला और उलझता गया और सिर्फ तारीखों पर तारीखें मिलती रहीं।

चुनाव की उम्मीद में संभावित उम्मीदवारों ने अपनी जेबें खाली कर दीं, लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगी। इस बार भी 6 मई की तारीख मिलने से उनकी होली बेरंग हो गई। हालांकि, कार्यकर्ताओं को खुश रखने के लिए वे अपने चेहरे की मायूसी छुपाकर उनके साथ घुलना-मिलना जारी रखेंगे। पिछले तीन वर्षों से कार्यकर्ता बैनर, पोस्टर और फंड जुटाने में लगे हुए हैं, लेकिन चुनाव की अनिश्चितता से वे भी थक चुके हैं। दूसरी ओर, नेताओं को नए कार्यकर्ता मिल गए हैं, जिससे पुराने उम्मीदवारों को अपने चुनावी भविष्य की चिंता सताने लगी है। यही कारण है कि वे हर कोर्ट की तारीख पर उम्मीद लगाए बैठे रहते हैं और जब फैसला टलता है, तो रात की बैठकों में एक-दूसरे को दिलासा देते हैं कि "चुनाव जरूर होंगे, हमें तैयारी जारी रखनी होगी।"

दिवाली के बाद ही बजेगा चुनावी बिगुल?

अब अगली सुनवाई 6 मई को होगी, लेकिन जानकारों का मानना है कि अगर इस तारीख को भी कोई ठोस निर्णय आया, तो भी चुनाव होने में कम से कम 4-5 महीने लगेंगे। 2022 में 97 नगर पालिकाओं के चुनाव की अधिसूचना जारी की गई थी, लेकिन अब तीन साल बीत चुके हैं। इस बीच, प्रभागों की जनसंख्या और मतदाता संख्या बढ़ गई है, जिसके कारण प्रभाग रचना में बदलाव करना अनिवार्य होगा।

इसके अलावा, आने वाले महीनों में मानसून, त्योहार और अन्य कारणों से चुनाव कराना मुश्किल होगा। आमतौर पर इन दिनों चुनाव नहीं कराए जाते। ऐसे में संभावित उम्मीदवारों को दिवाली तक फंडिंग की रसीदें काटनी ही पड़ेंगी। यही वजह है कि अब यह माना जा रहा है कि स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं के चुनावी पटाखे दिवाली के बाद ही फूटेंगे।