कानून सुधार या विदर्भ से विश्वासघात? विधायक नितिन राउत की सरकार को चेतावनी, कहा- अस्मिता से न हो खिलवाड़
नागपुर/मुंबई: महाराष्ट्र विधानसभा में पुराने और ब्रिटिश कालीन कानूनों को खत्म करने के सरकार के फैसले पर तीखी बहस देखने को मिली, जहां कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री Dr. Nitin Raut ने सीधे तौर पर सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि कानूनों में सुधार करना जरूरी है, लेकिन यह प्रक्रिया विदर्भ की अस्मिता और ऐतिहासिक Nagpur Pact को नजरअंदाज करके नहीं की जा सकती। राउत ने साफ शब्दों में चेतावनी दी कि अगर सरकार ने इन संवेदनशील मुद्दों को दरकिनार किया, तो यह केवल कानूनी बदलाव नहीं बल्कि विदर्भ के साथ अन्याय होगा।
राउत ने इस विधेयक को जल्दबाजी में पारित करने के खिलाफ जोरदार आवाज उठाते हुए कहा कि इसे सीधे पास करने के बजाय ‘जॉइंट सिलेक्ट कमेटी’ के पास भेजा जाना चाहिए, ताकि हर पहलू पर गंभीरता से विचार किया जा सके। उन्होंने सरकार के इस कदम को “समुद्रमंथन” तो बताया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि इस मंथन में अगर विदर्भ के अधिकार, उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सामाजिक संतुलन को शामिल नहीं किया गया, तो इसका परिणाम एकतरफा और अन्यायपूर्ण होगा।
उन्होंने 1960 में हुए नागपुर करार की याद दिलाते हुए कहा कि जब विदर्भ महाराष्ट्र में शामिल हुआ था, तब रोजगार, शिक्षा, कृषि और सिंचन जैसे क्षेत्रों में संतुलित विकास का वादा किया गया था। आज जब पुराने कानूनों को खत्म किया जा रहा है, तब यह सवाल उठना लाजमी है कि उन वादों और वैधानिक संरक्षण का क्या होगा। राउत ने यह भी कहा कि इन मुद्दों को नजरअंदाज करना विदर्भ की जनता के साथ विश्वासघात होगा।
सामाजिक न्याय के मुद्दे पर भी राउत ने सरकार को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने ब्रिटिश गजेटियर का हवाला देते हुए कहा कि हलबा और गोवारी समाज की कानूनी पहचान में समय के साथ बदलाव हुआ है, जिससे ये समुदाय अपने हक से वंचित रह गए हैं। नागपुर में 114 गोवारी समाज के लोगों के बलिदान का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि नए कानूनों में इन समुदायों को न्याय दिलाने के लिए ठोस प्रावधान होना जरूरी है, वरना यह सुधार अधूरा और अन्यायपूर्ण माना जाएगा।
नागपुर महानगरपालिका के उदाहरण से राउत ने यह भी बताया कि सीपी एंड बेरार काल के कानून और वर्तमान महाराष्ट्र के कानूनों के बीच टकराव के कारण कर्मचारियों की सेवा शर्तों में लगातार समस्याएं आती हैं। उन्होंने कहा कि सरकार अगर सच में सुधार चाहती है, तो ऐसे तकनीकी और प्रशासनिक पेचों को भी दूर करना होगा, वरना केवल कागजी बदलाव का कोई मतलब नहीं रहेगा।
इसके अलावा राउत ने यह भी आरोप लगाया कि कई महत्वपूर्ण कानूनों को इस विधेयक में शामिल ही नहीं किया गया है, जिनमें 1939 का भू-संपादन सुधार कानून, पुराने शिक्षा कानून और घरभाड़ा व वस्तु नियंत्रण कानून शामिल हैं। उन्होंने कहा कि इतने अहम विषयों को नजरअंदाज करना सरकार की गंभीरता पर सवाल खड़ा करता है।
अंत में राउत ने दो टूक कहा कि केवल प्रशासनिक स्तर पर या बंद कमरों में फैसले लेने से काम नहीं चलेगा। इस पूरे प्रक्रिया में जनभावनाओं, क्षेत्रीय संतुलन और सामाजिक न्याय को केंद्र में रखना होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि विधेयक को जॉइंट सिलेक्ट कमेटी के पास भेजा जाए, ताकि एक ऐसा कानून तैयार हो जो सभी वर्गों और क्षेत्रों के साथ न्याय कर सके।
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