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वाशिम में जल संकट: एक घड़ा पानी के लिए मीलों पैदल यात्रा, स्तिथि सुधारने प्रशासन खर्च करेगा 306 लाख रुपये


वाशिम: विदर्भ में सूरज की तपिश बढ़ने के साथ ही वाशिम जिले में जल संकट ने विकराल रूप धारण कर लिया है। ग्रामीण इलाकों में स्थिति इतनी गंभीर है कि महिलाओं और बच्चों को पीने के पानी के एक घड़े के लिए तपती धूप में लंबी पैदल यात्रा करनी पड़ रही है। इस संकट से निपटने के लिए प्रशासन ने 300 लाख से अधिक का मेगा प्लान तैयार किया है, लेकिन सवाल वही है कि क्या करोड़ों खर्च करने के बाद जनता की प्यास बुझेगी?

भीषण गर्मी और गहराता जल संकट

विदर्भ में बढ़ते तापमान के साथ वाशिम जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में जल संकट ने विकराल रूप ले लिया है। तपती धूप और सूखते जल स्रोतों के कारण स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि ग्रामीणों को पीने के पानी के एक घड़े के लिए मीलों लंबी पैदल यात्रा करनी पड़ रही है। साफ पानी की अनुपलब्धता के कारण लोगों में घबराहट और परेशानी साफ देखी जा सकती है।

हालांकि प्रशासन का दावा है कि वह किल्लत वाले इलाकों पर बारीकी से नजर रख रहा है, लेकिन करोड़ों रुपये खर्च करने की योजनाओं के बीच असली सवाल यही बना हुआ है कि क्या इन सरकारी उपायों से आम जनता को इस भीषण गर्मी में कोई वास्तविक राहत मिल पाएगी।

प्रशासनिक उपाय और भारी-भरकम बजट
इस संकट से निपटने के लिए जिला प्रशासन ने वर्ष 2025-26 हेतु कुल 317 उपायों को मंजूरी दी है, जिन पर लगभग 306 लाख रुपये खर्च होने का अनुमान है। अप्रैल 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में 33 महत्वपूर्ण योजनाओं को सीधे तौर पर लागू किया गया है, जिन पर 158 लाख रुपये का व्यय किया जा रहा है।

इन उपायों में टैंकरों से जलापूर्ति, नए कुएं खोदना, पुराने कुओं को गहरा करना, पाइपलाइन प्रोजेक्ट्स की मरम्मत और जल स्रोतों को मजबूत करना शामिल है। वर्तमान में लागू किए गए सभी 33 प्रोजेक्ट्स कुआं खुदाई से संबंधित हैं, जिनमें मनोरा तालुका में सर्वाधिक 10, वाशिम व करंजा में 8-8 और मालेगांव में 7 उपाय किए जा रहे हैं। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि आवश्यकता पड़ने पर स्थानीय स्तर पर तत्काल अतिरिक्त कदम भी उठाए जाएंगे।

पशुओं के लिए चारे का संकट और सुरक्षा योजना

पानी की कमी के साथ-साथ जिले पर चारे के संभावित संकट का साया भी मंडरा रहा है। इससे निपटने के लिए जिला स्तर पर 'चारा सुरक्षा प्लान' तैयार किया गया है। प्रशासन की योजना है कि जिला योजना समिति और आपदा राहत कोष के माध्यम से मक्का, ज्वार और बाजरा जैसे उच्च गुणवत्ता वाले चारे के बीजों की समय पर आपूर्ति की जाए।

इसके साथ ही हाइड्रोपोनिक चारा उत्पादन, मिनी TMR और कडबकुट्टी मशीनों के वितरण पर भी जोर दिया जा रहा है। जानवरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नदी और बांधों के किनारे चारे की खेती और उनके उचित भंडारण की विशेष प्लानिंग की गई है, ताकि भविष्य में होने वाली कमी को समय रहते दूर किया जा सके।