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अमरावती जिले के 20 गांवों में भूजल स्तर हुआ कम, आठ तहसीलों में स्थिति चिंताजनक


अमरावती: जिले की वरुड, नंदगांव खंडेश्वर, मोर्शी, अचलपुर, भातकुली, चांदुर बाजार, चिखलदरा, धरणी तहसील के 20 गांवों में भूजल स्तर कम हो गया है। जिले के 171 कुओं के अभिलेखित अवलोकन से यह बात सामने आई है कि कुछ स्थानों पर भूजल स्तर 20 मीटर से भी अधिक नीचे चला गया है।

जल विज्ञान परियोजना के अंतर्गत रूपात्मक वर्गीकरण के आधार पर 171 निगरानी कुओं का चयन किया गया है। अक्टूबर, दिसंबर, मार्च और मई में इसकी मैन्युअल रूप से त्रैमासिक निगरानी की जाती है। इसके अतिरिक्त, मासिक रूप से समानांतर और गहरे जल स्तर की निगरानी के लिए 55 पीज़ोमीटर ड्रिल किए गए हैं। यह डेटा GEMS वेबसाइट पर अपडेट किया गया है। इस जानकारी का उपयोग आगे भूजल गुणवत्ता अध्ययन और निगरानी प्रणालियों के लिए किया जा रहा है।

इस अध्ययन के लिए 150 जल गुणवत्ता केंद्रों का चयन किया गया था। जिन्हें पानी की गुणवत्ता के आधार पर बीएस-स्टेशन, टीएस-स्टेशन और टी-स्टेशन में विभाजित किया गया था। रासायनिक जीवाणु विश्लेषण के लिए प्रतिवर्ष पानी के नमूने लिए जाते हैं।

भूजल सर्वेक्षण विभाग के वरिष्ठ भूवैज्ञानिक राजेश सावले ने कहा कि जिले का उत्तरी भाग ज्यादातर पहाड़ी है और जंगलों से घिरा हुआ है। उत्तर-पश्चिमी भाग घने सागौन वन से घिरा हुआ है। मध्य भाग शुद्ध जलभृतों से ढका हुआ है, जिसका कुल क्षेत्रफल 3053 वर्ग किलो मीटर और ढलान 9 मीटर से लेकर 15 किमी तक गहरी है।

ईडब्ल्यू ढलान 15 मीटर गहराई से लेकर 15 किमी तक है। पूरे जलोधर में गीली, चिकनी मिट्टी, रेत शामिल है। जबकि सतपुड़ा पर्वतमाला की तलहटी में मिट्टी, पत्थर और बजरी है। इस क्षेत्र का कुल क्षेत्रफल 25 प्रतिशत है। अन्य 75 प्रतिशत क्षेत्र डेक्कन ट्रैप है। जो अधिकतर संयुक्त, वेसिकुलर बेसाल्ट प्रकार का होता है। 

अमरावती जिले का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 12,212 वर्ग किलोमीटर है जो महाराष्ट्र का केवल 3.97 प्रतिशत है। अमरावती जिले का 75 प्रतिशत भाग डेक्कन ट्रैप से घिरा हुआ है। जबकि 25 प्रतिशत क्षेत्र पूर्ण लुवियम से घिरा हुआ है। लुवियम का कुल क्षेत्रफल 3,053 वर्ग किलोमीटर है। जिसमें से 1,562 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र खारा क्षेत्र है। जो कि गुणवत्ता प्रभावित क्षेत्र है। इस क्षेत्र में सिंचाई एवं पेयजल के लिए भूजल का उपयोग नहीं किया जाता है। जिले के उत्तर-पूर्वी भाग में मुख्य रूप से संतरे की फसल को अधिक पानी दिया जाता है। जिससे भूजल में असंतुलन पैदा होता है।