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Bhandara

Bhandara: बावनथडी बांध पीड़ितों की त्रासदी: 2012 में पुनर्वास, पर आज भी मूलभूत सुविधाओं को तरस रहा कमकासुर गांव


भंडारा: विकास की बलि चढ़ना किसे कहते हैं, यह भंडारा जिले (Bhandara District) के कमकासुर गांव (Kamkasur Village) के लोगों से बेहतर कोई नहीं जान सकता। बावनथडी बांध (Bawanthadi Dam) के कारण विस्थापित हुए इस गांव की व्यथा आज भी कम नहीं हुई है। साल 2012 में गांव का पुनर्वास तो कर दिया गया, लेकिन एक दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी यह गांव सरकारी कागजों और सुविधाओं की बाट जोह रहा है।

कल के जमींदार, आज के मजदूर

तुमसर तहसील के अंतर्गत आने वाला यह 300 की आबादी वाला गांव कभी पहाड़ों और जंगलों के बीच बसा हुआ था। यहां के आदिवासी परिवार अपनी खेती-बाड़ी से खुशहाल जीवन जी रहे थे। किसी के पास 10 एकड़ तो किसी के पास 20 एकड़ उपजाऊ जमीन थी। बांध परियोजना के लिए सरकार ने इन जमीनों को मामूली दरों पर अधिग्रहित कर लिया। नतीजा यह हुआ कि जो किसान कभी खुद की जमीन के मालिक थे, वे आज दूसरों के खेतों में मजूरी करने को मजबूर हैं।

लोकसभा में हक, ग्राम पंचायत में 'नो एंट्री'

कमकासुर गांव की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां के नागरिक लोकसभा, विधानसभा और जिला परिषद चुनावों में तो मतदान करते हैं, लेकिन ग्राम पंचायत चुनाव के लोकतांत्रिक हक से वंचित हैं।

  • कारण: गांव का अब तक आधिकारिक रूप से 'पुनर्गठन' (Reconstitution) नहीं किया गया है।
  • परिणाम: स्थानीय स्तर पर गांव का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होने के कारण ग्रामीण अपने ग्राम प्रधान या पंचायत प्रतिनिधि को नहीं चुन पा रहे हैं।

सुविधाओं के नाम पर सिर्फ ढांचा

पुनर्वास नीति के तहत मिलने वाली मूलभूत सुविधाएं जैसे पीने का साफ पानी, पक्की सड़कें, बिजली, स्वास्थ्य केंद्र और स्कूल—आज भी इस गांव के लिए एक सपना बनी हुई हैं। रोजगार का कोई साधन न होने के कारण बड़ी संख्या में युवाओं और परिवारों ने गांव से पलायन कर लिया है।

क्या कहते हैं ग्रामीण और नेता?

ग्रामीण किशोर उईके और प्रदीप खंडाते का कहना है कि वे केवल नाम के लिए विस्थापित हुए हैं। न तो पुरानी खेती रही और न ही नए स्थान पर कोई भविष्य दिख रहा है। वहीं, आदिवासी नेता अशोक उईके ने प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार की पुनर्वास नीति केवल कागजों पर सफल दिखती है, हकीकत में इन आदिवासियों का जीवन संघर्षपूर्ण हो गया है।

प्रशासन से न्याय की गुहार

पुनर्वास के दो दशक (प्रक्रिया शुरू होने से अब तक) बीत जाने के बाद भी कमकासुर के नागरिक अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या 'विकास' की कीमत हमेशा इन बेबस आदिवासियों को ही चुकानी पड़ेगी? ग्रामीणों ने मांग की है कि जल्द से जल्द गांव का आधिकारिक पुनर्गठन किया जाए और उन्हें ग्राम पंचायत चुनाव में मतदान का अधिकार देते हुए सभी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।