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"One Nation One Election"; क्या होगा बदलाव, भारत में पहले कब हुए एक साथ चुनाव?


नई दिल्ली: देश में हर छह महीने में कही न कहीं चुनाव होते हैं। ऐसे में देश को एक राष्ट्र एक चुनाव की ओर ले जाना जरूरी है। 15 अगस्त 2024 को लाल किले के प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह बात कही थी। करीब 34 दिन बाद प्रधानमंत्री ने अपनी बात को धरातल पर उतारने का काम शुरू कर दिया। केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार को पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में गठित समिति की रिपोर्ट को अपनी मंजूरी दे दी। जिसके बाद देश में एक साथ चुनाव कराने की शुरुआत हो चुकी है। आगमी शीतकालीन सत्र में सरकार इसको लेकर विधेयक पेश करेगी।

ज्ञात हो कि, पिछले साल दो सितंबर 2023 को केंद्र सरकार ने एक साथ चुनाव कराने के लिए एक समिति का गठन किया था। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में गठित इस समिति में देश के जाने माने विद्वान और कानून से जुड़े हुए लोग शामिल थे। जिसमें पूर्व अटॉर्ने जनरल हरीश साल्वे, गृहमंत्री अमित शाह, तत्कालीन लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष अधीर रंजन चौधरी सहित अन्य लोग शामिल थे। समिति ने 191 दिनों की चर्चा और परीक्षन के बाद 14 मार्च 2024 को 18,646 पन्नों की रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दी थी। 

भारत में एक साथ चुनाव का पहला मौका नहीं
देश में एक साथ चुनाव कराने का निर्णय पहली बार नहीं लिया गया है। 1952 से लेकर 1967 तक करीब 15 साल विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ होते रहे थे। हालांकि, 1967 में कई विधानसभा  और 1970 में तय समय से पहले लोकसभा को भंग  कर दिया गया था। जिसके कारण एक साथ चुनाव कराने की परंपरा समाप्त हो गई।  हालांकि, आज भी कई राज्यों के चुनाव लोकसभा के साथ होते हैं, जिसमें ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश जैसे राज्य शामिल है।

कोविंद समिति ने क्या दिए सुझाव
पूर्व राष्ट्रपति की अगुवाई वाली समिति ने एक साथ चुनाव कराने को लेकर कई सुझाव केंद्र सरकार को दिए हैं। जिसमें राज्यों के कार्यकाल को बढ़ाना, दो चरणों में देश में तमाम चुनाव कराना शामिल है।

यह रहे सुझाव
सभी विधानसभाओं का कार्यकाल अगले लोकसभा चुनाव यानी 2029 तक बढ़ाया जाए। पहले चरण में लोकसभा-विधानसभा चुनाव और फिर दूसरे चरण में 100 दिन के भीतर स्थानीय निकाय चुनाव कराए जा सकते हैं। चुनाव आयोग लोकसभा, विधानसभा व स्थानीय निकाय चुनावों के लिए सिंगल वोटर लिस्ट और वोटर आईडी कार्ड बनाए। देश में एक साथ चुनाव कराने के लिए उपकरणों, जनशक्ति और सुरक्षा बलों की एडवांस प्लानिंग करने की भी सिफारिश की है।

एक साथ चुनाव से क्या होगा बदलाव? 
वर्तमान में देश के किसी न किसी कोने में चुनाव होते रहते हैं। कभी विधानसभा तो कभी स्थानीय चुनाव। चुनाव के करण उन क्षेत्रों या प्रदेशों में अचार संहिता लगी रहती है। जिसके कारण विकास के कामों में बड़ी परेशानी होती है। पूराने काम को न पूरा किया जा सकता है और न नए काम शुरू हो सकते हैं। राज्य सरकार सहित स्थानीय प्रशासन चुनाव परिणाम आने तक एक बंदी के भांति रहते हैं। वहीं अलग अलग चुनाव कराने से खर्च बढ़ता है इसी के साथ चुनाव में लगने वाला मानवश्रम भी बढ़ता है।

एक साथ चुनाव कराने से इन तमाम परेशानियों का समाधान निकल सकता है। एक साथ चुनाव कराने से जहां चुनाव के समय लगने वाले खर्च में कटौती होगी, वहीं बार बार लगने वाले आचार संहिता से भी छुटकारा मिलेगा। जिससे प्रशासनिक कार्यों में तेजी आयेगी और विकास के काम ज्यादा और जल्दी होंगे। इसी के साथ चुनाव के समय राजनीतिक पार्टियां जो लोक लुभावन वादे करती हैं उससे भी निजात मिलेगी। और सबसे महत्वपूर्ण चुनाव में जनता की भागीदारी बढ़ेगी जिसका परिणाम वोट प्रतिशत पर भी दिखाई देगा।