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भारत के चंद्रयान 3 मिशन में खामगांव की बड़ी हिस्सेदारी,जाने कैसे


बुलढाणा: भारत का महत्वाकांक्षी चंद्रयान-3 अपने मिशन पर चन्द्रमा की ओर जा रहा है. महीनों की कड़ी मेहनत के बाद चंद्रयान-3 शुक्रवार की दोपहर 2:35 बजे श्रीहरिकोटा के सतीश धवल अंतरिक्ष केंद्र से रवाना हुआ। इस चंद्रयान को बनाने के लिए कई वैज्ञानिकों ने कड़ी मेहनत की है और खास बात तो ये है की इसमें रजतनगर खामगांव का भी बहुत बड़ा योगदान है। इस चंद्रयान में पूरे देश में मशहूर खामगांव एमआईडीसी के विकमस फैब्रिकेशन के थर्मल शील्ड्स का इस्तेमाल किया गया है। इस ढाल को बनाने में काफी मेहनत लगी है और ये कहना गलत नहीं होगा की चंद्रयान में खामगांव की सामग्री का इस्तेमाल किया गया है. ये खामगांव के लिए बड़ी उपलब्धि है. खामगांव एमआईडीसी में श्रद्धा रिफाइनरी द्वारा निर्मित सिल्वर स्टिलिंग ट्यूब का  का इस्तेमाल भी चंद्रयान -3 में किया गया है। इसमें 90 फीसदी चांदी और 10 फीसदी तांबे का इस्तेमाल किया गया था.पहले ये सिल्वर स्टिलिंग ट्यूब विदेश से मंगवाए जाते थे. लेकिन अब खामगांव स्थित श्रद्धा रिफाइनरी के सिल्वर स्टिलिंग ट्यूब का उपयोग किया जाता है. इस संबंध में श्रद्धा रिफाइनरी के संचालक शेखर भोसले ने जानकारी दी. अंतरिक्ष अभियान में  खामगांव के इस योगदान से अब खामगांव के साथ एक और स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है। चांदी के काम के लिए खामगांव देश भर में प्रसिद्ध है. शेखर भोसले ने बताया की खामगांव को चांदी के लिए पहचाना जाता है लेकिन चांदी का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर औद्योगिक उपकरण बनाने के लिए भी किया जाता है इसकी जानकारों लोगों के बीच कम ही है.चांदी विद्युत् वाहक है.चंद्रयान में जहां-जहां रोटरी सिस्टम था वहां इसका इस्तेमाल किया गया है.चांदी का इस्तेमाल चंद्रयान में इसलिए भी किया गया ताकि इसका वजन कम रखा जा सके अगर कंडक्टिविटी के लिए तांबे का ही इस्तेमाल किया जाता तो इससे वजन काफ़ी बढ़ जाता। भोसले ने बताया की इसरो की जरुरत को पूरा करने बेहद चुनौती पूर्ण रहा क्यूंकि 90 फीसदी चांदी और 10 प्रतिशत तांबे का इस्तेमाल कर शील्ड्स को बनाना चुनौतीपूर्ण रहा क्यूंकि इसे वैक्यूम कर बनाना था.