Mental Wellness: द ‘नो-स्क्रीन’ संडे चैलेंज: सप्ताह में एक दिन का डिजिटल ब्रेक देती है असल जिंदगी से जुड़ने का मौका
डिजिटल डिटॉक्स और मेंटल वेलनेस: नोटिफिकेशन की आवाज, सोशल मीडिया की स्क्रॉलिंग और स्क्रीन पर बीतते घंटों के बीच क्या हम अपने लिए भी वक्त निकाल पा रहे हैं? सुबह आंख खुलते ही फोन चेक करना और रात को सोने से पहले आखिरी बार सोशल मीडिया देखना हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। ऐसे में ‘नो-स्क्रीन संडे’ एक ऐसी पहल है, जो लोगों को सप्ताह में एक दिन डिजिटल दुनिया से ब्रेक लेकर असल जिंदगी से जुड़ने का मौका देती है।
क्या है ‘नो-स्क्रीन’ संडे चैलेंज?
इस चैलेंज का मकसद रविवार को सोशल मीडिया, मोबाइल और अन्य डिजिटल स्क्रीन से दूरी बनाकर दिन को ज्यादा सुकून और सार्थकता के साथ बिताना है। इसका मतलब फोन को पूरी तरह त्यागना नहीं, बल्कि उसका इस्तेमाल जरूरत के मुताबिक सीमित करना है। शुरुआत कुछ घंटों से की जा सकती है। धीरे-धीरे इसे पूरे रविवार तक बढ़ाया जा सकता है।
स्क्रीन से दूरी, अपनों से नजदीकी
रविवार की सुबह अलार्म बंद करने के बाद फोन उठाने के बजाय बालकनी में बैठकर चाय पीजिए, अखबार पढ़िए या सुबह की सैर पर निकल जाइए। परिवार के साथ नाश्ता करें, बच्चों के साथ खेलें और दोस्तों या रिश्तेदारों से फोन पर चैट करने के बजाय मिलकर बातचीत करें। घर में रखी किताब पढ़ना, पसंदीदा संगीत सुनना, खाना बनाना, बागवानी करना या कोई पुराना शौक दोबारा शुरू करना भी इस दिन को खास बना सकता है। ये छोटी-छोटी गतिविधियां दिन को अधिक आनंददायक बना सकती हैं।
चैलेंज को सफल बनाने के प्रैक्टिकल तरीके
इसकी शुरुआत के लिए शनिवार रात ही तैयारी कर लें। रविवार को गैरजरूरी नोटिफिकेशन बंद कर दें और सोशल मीडिया ऐप्स से लॉगआउट कर दें। फोन को हर समय पास रखने के बजाय किसी निश्चित जगह पर रखें। परिवार के सभी सदस्य मिलकर चैलेंज अपनाएं, ताकि किसी को अकेलापन महसूस न हो।
अनुभव साझा करें, दूसरों को भी करें प्रेरित
इस पहल को और दिलचस्प बनाने के लिए लोग अपने ‘नो-स्क्रीन संडे’ के अनुभव साझा कर सकते हैं। बताएं कि फोन के बिना दिन कैसा रहा, किस गतिविधि में सबसे ज्यादा मजा आया और क्या परिवार के साथ बातचीत के लिए ज्यादा समय मिला। चाहें तो अपनी पसंदीदा ऑफलाइन एक्टिविटी की तस्वीर साझा करें, लेकिन तस्वीर खींचने के लिए बार-बार फोन इस्तेमाल करने से बचें।
एक दिन का बदलाव, बेहतर आदत की शुरुआत
डिजिटल स्क्रीन से थोड़ी दूरी कुछ लोगों को तनाव कम करने, बेहतर नींद की दिनचर्या बनाने और रिश्तों पर ध्यान देने में मदद कर सकती है। हालांकि, हर व्यक्ति का अनुभव अलग हो सकता है। जरूरी यह है कि इस रविवार खुद को एक मौका दिया जाए। आखिर जिंदगी की सबसे खूबसूरत यादें हमेशा स्क्रीन पर नहीं, बल्कि उन पलों में बनती हैं जिन्हें हम अपनों के साथ जीते हैं।
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