SIR पर चुनाव आयोग का बड़ा यू-टर्न, फॉर्म-6 से हटाया विवादित प्रावधान
- दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बाद आयोग ने बदले फैसले
- पांच सप्ताह के भीतर कई निर्णयों से पीछे हटना पड़ा
नई दिल्ली: देश में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चुनाव आयोग एक बार फिर चर्चा में है। कुछ राज्यों में SIR की प्रक्रिया शुरू होने के बाद मतदाता पंजीकरण से जुड़े फॉर्म-6 में शामिल किए गए प्रावधानों को लेकर विवाद सामने आया है। आयोग ने अब फॉर्म-6 से SIR से संबंधित विवादित घोषणा को हटा दिया है। बताया जा रहा है कि इस मामले में चुनाव आयोग के भीतर भी आपत्तियां उठाई गई थीं। इसके बाद आयोग को अपने फैसले में बदलाव करना पड़ा। पिछले कुछ समय में आयोग द्वारा लिए गए कई निर्णयों को लेकर भी सवाल उठे हैं और आपत्तियों के बाद उनमें संशोधन किया गया है।
फॉर्म-6 से हटाया SIR से जुड़ा प्रावधान
चुनाव आयोग ने मतदाता सूची में नए नाम शामिल कराने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में 'जे' और 'के' विभागों के बीच एक घोषणा-पत्र शामिल किया था। इस घोषणा-पत्र में आवेदकों से कुछ अतिरिक्त जानकारियां और विवरण मांगे जाने का प्रावधान था। हालांकि, अब आयोग ने इस घोषणा-पत्र को फॉर्म-6 से हटा दिया है।
इससे पहले फॉर्म-6 के माध्यम से आवेदन करने वाले लोगों के लिए तीन प्रमुख जानकारियां देना अनिवार्य किए जाने की बात सामने आई थी। इनमें आवेदक के माता-पिता अथवा उनके परिवार से संबंधित विवरण भी शामिल थे। यदि माता-पिता का नाम उपलब्ध नहीं होता, तो अन्य पारिवारिक जानकारी देने का विकल्प भी रखा गया था।
इस व्यवस्था को लेकर सवाल उठने के बाद आयोग ने इसमें बदलाव किया। अब फॉर्म-6 और SIR के लिए अलग-अलग प्रक्रियाओं के माध्यम से जानकारी लेने की व्यवस्था पर जोर दिया जा रहा है।
आपत्तियों के बाद आयोग को बदलने पड़े फैसले
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले करीब दस महीनों में चुनाव आयोग के कुछ महत्वपूर्ण निर्णयों को लेकर दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं। इन आपत्तियों के बाद आयोग को कई मामलों में अपने निर्णयों पर पुनर्विचार करना पड़ा। कुछ फैसलों को वापस लेने और कुछ में संशोधन करने की स्थिति बनी।
इस पूरे घटनाक्रम ने चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया और उसके भीतर होने वाली चर्चा को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। खासतौर पर मतदाता सूची पुनरीक्षण जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में नियमों और निर्देशों को लेकर स्पष्टता बनाए रखना आयोग के सामने बड़ी चुनौती है।
पांच सप्ताह में कई फैसलों पर यू-टर्न
चुनाव आयोग के हालिया कामकाज में कुछ ऐसे फैसले भी सामने आए हैं, जिनमें पहले निर्देश जारी किए गए और बाद में उनमें बदलाव करना पड़ा।
- बैठक और निर्णय प्रक्रिया: आयोग की बैठकों और उनमें लिए गए निर्णयों को लेकर सवाल उठे। कुछ मामलों में जारी निर्देशों पर पुनर्विचार की स्थिति बनी।
- विदेश में रहने वाले मतदाताओं का मामला: विदेश में रहने वाले भारतीय मतदाताओं से संबंधित प्रक्रिया और दस्तावेजों को लेकर भी आयोग के स्तर पर चर्चा हुई।
- नई तकनीकी व्यवस्था: मतदाता सूची से जुड़े कामकाज में नए मॉड्यूल और पोर्टल के इस्तेमाल को लेकर भी बदलाव किए गए।
- ECINET का ऑडिट: ECINET से संबंधित कार्यप्रणाली और नियमों की जांच के लिए ऑडिट की व्यवस्था को लेकर भी निर्णय सामने आए।
26 अक्टूबर को न्यायालय में भी प्रस्तुत किया गया पक्ष
रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग ने 26 अक्टूबर को सर्वोच्च न्यायालय में भी अपना पक्ष प्रस्तुत किया। आयोग की ओर से मतदाता सूची पुनरीक्षण और उससे संबंधित प्रक्रियाओं को लेकर जानकारी दी गई। वहीं, फॉर्म-6 और SIR के लिए अलग-अलग प्रावधानों को लेकर भी चर्चा सामने आई।
मतदाता सूची की पारदर्शिता पर फिर उठे सवाल
SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना, पात्र मतदाताओं के नाम शामिल करना और अपात्र प्रविष्टियों को हटाना है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में दस्तावेजों, पारिवारिक विवरण और घोषणा-पत्रों से जुड़े नियमों को लेकर स्पष्टता बेहद जरूरी है।
फॉर्म-6 से SIR संबंधी घोषणा-पत्र हटाने का फैसला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि नए मतदाताओं के पंजीकरण और विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर अलग-अलग नियमों की जरूरत पर सवाल उठ रहे थे।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि चुनाव आयोग आगे इस प्रक्रिया को किस तरह लागू करता है और मतदाताओं को दस्तावेजों तथा आवेदन से जुड़ी कितनी स्पष्ट जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। आयोग के फैसलों में बार-बार बदलाव की स्थिति से उसकी कार्यप्रणाली पर बहस तेज होना भी स्वाभाविक है।
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