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Yavatmal

Assembly Election 2024: देश की ऐसी विधानसभा जिसपर किसी पार्टी नहीं केवल एक परिवार का कब्जा, 72 साल से कोई और नहीं जीत पाया


यवतमाल: देश में कई ऐसी लोकसभा और विधानसभा सीट है जिसे हम हॉट सीट या एक परिवार या व्यक्ति की सीट कहते हैं। उदाहरण के तौर पर अमेठी और रायबरेली गांधी परिवार या कहें कांग्रेस की सीट मानी है। वहां उनके अलावा अन्य किसी की जीत मुश्किल रहती है। उसी तरह मैनपुरी को समाजवादी पार्टी या कहें मुलायम परिवार की सीट शामिल है। हालांकि, इन सीटों पर दोनों परिवारों या पार्टियों को हार का भी सामना करना पड़ा है। लेकिन, देश में बदल एक ऐसी विधानसभा सीट है जहां किसी पार्टी की नहीं एक परिवार की चलती है। उस परिवार का नेता जीस पार्टी में गया वहां उस पार्टी को जीत मिलती है। जी हां हम बात कर रहे हैं, पुसद विधानसभा सीट की। जहां पार्टी के नाम पर नहीं बल्कि नाईक परिवार के नाम पर वोट डाला जाता है। 

पुसद विधानसभा सीट राज्य की 288 विधानसभा सीटों में से एक है। यवतमाल जिले में आनी वाली यह बेहद अहम और हॉट विधानसभा सीट है। राज्य के दो मुख्यमंत्री वसंतराव नाईक और सुधाकरराव नाईक इस सीट का प्रतिनिधत्व कर रहे हैं। वर्तमान में इन्ही के परिवार के इंद्रनील मनोहर नाईक यहां से विधायक हैं। 2019 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार निलय नाईक को नौ हज़ार से ज्यादा वोटों से हराया था। इंद्रनील को जहां कुल मतदान का 89,143 वोट मिल था। वहीं निलय को 79,443 वोटों से संतोष करना पड़ा था। 

जान लें विधानसभा सीट का इतिहास

1952 के परिसीमन में सीट का निर्माण किया गया था और उसी साल यहां विधानसभा चुनाव हुई थे। जिसमें कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ने वाले वसंतराव नाईक पहली बार विधायक बने। जहां वह 1972 तक यहां से चुनाव जीतते रहे। इस दौरान वह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री भी बने। वहीं उनके बाद 1978 में उन्हीं के परिवार के सुधरराव नाईक विधायक बने। 1999 तक वह यहां से चुनाव जीतते रहे। इस दौरान वह मुख्यमंत्री भी बने। सुधाकरराव को महाराष्ट्र में पंचायती राज को जमीन तक ले जानें के लिए जाना जाता है। हालांकि, 2001 में उनके निधन के बाद उनके भाई मनोहर चुनाव लड़े और जीते। 2019 से उन्हीं के परिवार के इंद्रनील नाईक यहां से विधायक हैं। 

विधानसभा चुनाव में नाईक परिवार सबसे बड़ा फैक्टर

जैसा की हमने पहले बताया इस विधानसभा सीट पर पार्टियों के नाम पर नहीं बल्कि नाईक परिवार के नाम पर वोट डाला जाता है। पिछले 72 साल से इस सीट पर केवल नाईक परिवार का कब्जा है। 1999 तक यह सीट कांग्रेस का गढ़ थी कारण की नाईक परिवार के वसंतराव नाईक और सुधाकरराव नाईक कांग्रेस पार्टी में थे। वहीं जब शरद पवार ने विदेशी महिला के नाम पर कांग्रेस से बगावत की और अपनी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बनाई तो नाईक परिवार एनसीपी में शामिल हो गया। और तभी से यहां एनसीपी का कब्जा है। वहीं जब एनसीपी में बगावत हुई तो इंद्रनील अजीत पवार के साथ आ गए। वहीं अन्य पार्टियों। की बात करें तो यहां दूसरे और तीसरे नंबर पर कौन होगा इसको लेकर लड़ाई होती है। 2019 के विधानसभा चुनाव में 41 प्रतिशत वोट के साथ भाजपा यहां दूसरे नंबर पर थी। 

विधानसभा में जातियां समीकरण

पुसद विधानसभा सीट एक ग्रामीण विधानसभा है। जिसका 75 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा ग्रामीण और 25 प्रतिशत शहरी क्षेत्र में आता है। 2011 की जनगणना की बात करें तो यहां 44,287 अनुसूचित जनजाति 41,048 अनुसूचित जाति और 28,883 मुस्लिम मतदाता है। वहीं इस विधानसभा क्षेत्र में सबसे ज्यादा बंजारा समाज के मतदाता मौजूद हैं। वहीं वर्तमान में भी वसंतराव नाईक को समाज का सबसे बड़ा नेता माना जाता है। इसके बाद समाज में सुधाकरराव नाईक को बड़ा माना जाता है। एक सबसे महत्वपूर्ण की उनके मुख्यमंत्री काल में पंचायती राज को जमीन पर मजबूत करने सहित राज्य में सिंचाई के लिए जो बुनियादी ढांचा विकसित किया गया। 

विधानसभा क्षेत्र के प्रमुख मुद्दे

ग्रामीण क्षेत्र होने के नाते कृषि यहां की प्रमुख आजीविका का श्रोत है। कृषि से संबंधित समस्याएं यहां प्रमुख मुद्दे हैं। लेकिन जो सबसे बड़ी समस्या है वह है सिंचाई के लिए पानी और किसान आत्महत्या। राज्य में यवतमाल जिला किसान आत्महत्या के लिए बदनाम है। रोजाना जिले के किसी न किसी किसान द्वारा आत्महत्या करने की घटना सामने आती है। फसल खराब, उत्पाद का सही दाम न मिलना आत्महत्या के प्रमुख कारण है। सरकार द्वारा लगातार इसपर रोक लगाने का प्रयास किया जाता है लेकिन वह नाकाफी होता है।  इसी के साथ सिंचाई के लिए पानी भी यहां प्रमुख मुद्दो में से एक है। पुसद से भले ही दो मुख्यमंत्री रहे हो। लेकिन उद्योग के मामले में यह बेहद पिछड़ा हुआ है। एक दो छोटी कम्पनियों और कारखानों को छोड़ दें तो कोई बड़ा उद्योग इस विधानसभा में नहीं है, जिसके कारण यहां के लोगों को राज्य के दूसरे बड़े शहरों में जाना पड़ता है। इसी के सड़क ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क निर्माण भी एक मुद्दा है। 

इंद्रनील की राह कठिन!

जैसे की हमने पहले ही बताया यहां पार्टियों से ज्यादा एक परिवार मजबूत है। विधानसभा की राजनीति उसी परिवार के इर्दगिर्द घूमती है। फिर चाहे वह सत्तापक्ष के साथ हो या विपक्ष के साथ। 2019 में जहां एनसीपी की टिकट पर इंद्रनील नाईक चुनाव जीते थे। जहां उन्हें बंजारा सहित मुस्लिम और अनुसूचित जाती का भी अच्छा वोट मिला था। हालांकि, इस बार विधानसभा की सूरत थोड़ी बदली हुई दिखाई दे रही है। इंद्रनील वर्तमान में एनसीपी अजीत गुट के साथ है। पिछले चुनाव में एनसीपी एकजुट थी जिसका फायदा उन्हें मिला था। लेकिन इस बार उसमें विभाजन है। लोकसभा चुनाव को देखें तो मुस्लिम मतदाताओं ने एक तरफा महाविकास आघाड़ी के संजय देशमुख को मतदान किया। वहीं इस बार भी वैसी स्थिति बनती दिखाई दे रही है।पिछले चुनाव में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले निलय नाईक सीट नहीं मिलते देख शरद पवार के साथ जा सकते हैं जिसके कारण बंजारा वोटो में बड़ा विभाजन देखने को मिल सकता है। इन तमाम कारणों को देखते हुए इस बार इंद्रनील की राह बेहद मुश्किल दिखाई दे रही है।