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Nagpur

नक्सल आंदोलन को सबसे बड़ा झटका, पोलित ब्यूरो सदस्य भूपति ने 60 साथियों के साथ किया सरेंडर; 10 करोड़ से ज़्यादा का था इनाम, 16 को CM के सामने डालेंगे हथियार


गढ़चिरौली: महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में नक्सल आंदोलन को एक अभूतपूर्व झटका लगा है। सीपीआई (माओवादी) के पोलित ब्यूरो और केंद्रीय समिति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक मल्लोजुला वेणुगोपाल उर्फ ​​भूपति उर्फ ​​सोनू ने अपने 60 साथियों के साथ गढ़चिरौली पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। भूपति पर विभिन्न राज्यों में दस करोड़ रुपये से अधिक का इनाम घोषित था। सूत्रों के मुताबिक, वह 16 अक्टूबर को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के सामने औपचारिक रूप से हथियार डाल सकते हैं।

मतभेद और 'सशस्त्र संघर्ष' की विफलता

वरिष्ठ नक्सली रणनीतिकार माने जाने वाले भूपति ने महाराष्ट्र-छत्तीसगढ़ सीमा पर लंबे समय तक प्लाटून गाइड के रूप में काम किया। हालांकि, पिछले कुछ महीनों से उनका नक्सली संगठन के शीर्ष नेतृत्व से वैचारिक मतभेद चल रहा था।

  • भूपति का रुख: उन्होंने खुलकर स्वीकार किया था कि 'सशस्त्र संघर्ष' विफल हो चुका है। एक पर्चे में उन्होंने जनसमर्थन में कमी आने और सैकड़ों साथियों के मारे जाने का हवाला देते हुए संघर्ष की बजाय बातचीत (War-truce) को एकमात्र विकल्प बताया था।

  • संगठन में दरार: उनके इस रुख का संगठन के महासचिव थिप्पारी तिरुपति उर्फ ​​देवजी के नेतृत्व वाले धड़े ने कड़ा विरोध किया। हालांकि, संगठन की केंद्रीय समिति ने भूपति पर दबाव बनाकर उन्हें हथियार डालने का आदेश दिया, जिसके बाद उन्होंने संगठन से बाहर निकलने की घोषणा कर दी।

पुनर्वास की ओर बड़ा कदम

भूपति के आत्मसमर्पण को गढ़चिरौली में चल रहे आत्मसमर्पण अभियान की सबसे बड़ी सफलता माना जा रहा है। जनवरी में उनकी पत्नी और वरिष्ठ नेता तारक्का भी आत्मसमर्पण कर चुकी हैं। यद्यपि पुलिस ने अभी तक इस आत्मसमर्पण की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन गढ़चिरौली पुलिस बल के सूत्रों ने इसकी पुष्टि की है। बताया गया है कि भूपति और उनके 60 साथियों के समूह को फिलहाल पुलिस सुरक्षा में रखा गया है, और उन्हें सरकार की आत्मसमर्पण और पुनर्वास योजना के तहत सुरक्षा का आश्वासन दिया गया है।

क्या यह नक्सल आंदोलन का अंत है?

भूपति का आत्मसमर्पण, जो पिछले दो दशकों में गढ़चिरौली में आत्मसमर्पण करने वाले 700 से अधिक नक्सलियों की शृंखला में सबसे बड़ा कदम है, नक्सल आंदोलन को निर्णायक रूप से कमज़ोर कर सकता है। सुरक्षा हलकों में यह चर्चा तेज़ हो गई है कि दंडकारण्य के जंगलों में वर्षों से चला आ रहा नक्सल आंदोलन अब अपने अंतिम चरण में है। भूपति के इस फ़ैसले को 'जनयुद्ध' के अंत का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है।