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आधुनिक दौर में आदर्श जीवन जीने की सीख देने वाले राष्ट्रसंत को एक साथ पांच लाख लोगों ने दी मौन श्रद्धांजलि


अमरावती- आदर्श जीवन शैली की पाठ सिखाने वाले तुकडोजी महाराज को उनके कार्य और उपलब्धियों के बदौलत ही राष्ट्रसंत की उपाधि दी गई है।  उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें दी जाने वाली श्रद्धांजलि देश का इकलौता कार्यक्रम है जहां पांच लाख श्रद्धालु इतने अनुशासित तरीके से एक जगह उपस्थित होते हैं। देश में एक ही समय में एक संत को मौन सम्मान देने का यह एकमात्र कार्यक्रम है. 


देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस की तारीफ की पिछले 2 साल कोरोना संकट की वजह से सार्वजनिक समारोह और कार्यक्रमों पर पाबंदी थी. इस पाबंदी का असर गुरुकुंज मोझरी में भी था. लेकिन इस वर्ष विशेष आयोजन किया गया जिसमे केवल देश से ही नहीं बल्किअमेरिका, इंग्लैंड, जॉर्जिया, जर्मनी, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका आदि से विदेशी गुरुदेव भक्त भी गुरुदेव को श्रद्धांजलि देने पहुंचे। 
 
मराठी पंचांग के अनुसार राष्ट्रसंत का महानिर्वाण अश्विन माह के पंचमी को 1968 के दिन हुआ था. दिन 11 अक्टूबर का था। राष्ट्रसंत ने शाम 4:58 बजे  संसार से विदा ली थी.तब से सभी धार्मिक संप्रदायों के भक्त श्रीक्षेत्र गुरुकुंज में भक्ति के साथ इकट्ठा होते हैं और अश्विन माह के पंचमी पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। पिछले 53 वर्षों से मौन श्रद्धांजलि अर्पित की जाती रही है।
राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज जी का जन्म 30 अप्रैल 1909 को महाराष्ट्र के अमरावती जनपद के यावली नामक एक दूरदराज के गांव में एक गरीब परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा यावली और वरखेड में पूरी की। प्रारंभिक जीवन में ही उनका संपर्क बहुत सारे महान संतों के साथ हो गया था। समर्थ आडकोजी महाराज ने उनके ऊपर अपने स्नेह की वर्षा की और उन्हें योग शक्तियों से विभूषित किया। तुकडोजी ने सालबर्डी की पहाड़ियों पर महारुद्र यज्ञ का आयोजन किया। जिसमें तीन लाख से अधिक लोगों ने भाग लिया। इस यज्ञ के बाद उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई और वे पूरे मध्य प्रदेश में सम्माननीय हो गए। 1936 में महात्मा गाँधी द्वारा सेवाग्राम आश्रम में उन्हें आमंत्रित किया गया, जहां वह लगभग एक महीने रहे, उसके बाद तुकडोजी ने सांस्कृतिक और आध्यात्मिक कार्यक्रमों द्वारा समाज में जनजागृति का काम प्रारंभ कर दिया,जो 1942 के राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के रूप में लक्षय को प्राप्त हुआ। 
तुकडोजी के ही आह्वान का परिणाम था. "आष्टी-चिमूर स्वतंत्रता संग्राम",इसके चलते अंग्रेजों द्वारा उन्हें चंद्रपुर में गिरफ्तार कर नागपुर और फिर रायपुर के जेल में 100 दिनों (28 अगस्त से 02 दिसंबर 1942 तक) के लिए कैद कर लिया गया। जेल से छूटने के बाद तुकडोजी ने सामाजिक सुधार आंदोलन चलाकर अंधविश्वास, छुआछूत, मिथ्या धर्म, गोवध एवं अन्य सामाजिक बुराइयों के खिलाफ संघर्ष किया। उन्होंने नागपुर से 120 किमी दूर मोझरी नामक गाँव में गुरूकुंज आश्रम की स्थापना की.जहाँ उनके अनुयायियों की सक्रिय सहभागिता से संरचनात्मक कार्यक्रमों को चलाया जाता था। आश्रम के प्रवेश द्वार पर ही उनके सिद्धांत आज भी इस प्रकार अंकित हैं  “इस मन्दिर का द्वार सबके लिए खुला है, हर धर्म और पंथ के व्यक्ति का यहां स्वागत है, देश और विदेश के हर व्यक्ति का यहां स्वागत है” 
तुकडोजी ने अपना पूरा ध्यान ग्रामीण पुर्न-निर्माण की ओर लगाया और रचनात्मक काम करने वालों के लिए कई प्रकार के शिविरों को आयोजित किया। उनके क्रियाकलाप अत्यधिक प्रभावकारी और राष्ट्रीय हित से जुड़े हुए थे। तत्कालीन भारत के राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने गुरूकुंज आश्रम के एक विशाल समारोह में उनके ऊपर अपना स्नेह समर्पित करते हुए आदर के साथ “राष्ट्रसंत” के सम्मान से प्रतिष्ठित किया। उस समय से उन्हें लोग अत्यधिक आदर के साथ “राष्ट्रसंत” के उपनाम से बुलाने लगे।
 

राष्ट्रसंत तुकडोजी द्वारा भारत साधु समाज का आयोजन किया गया, जिसमें विभिन्न संप्रदायों, पंथों और धार्मिक संस्थाओं के प्रमुखों की सक्रिय सहभागिता देखने को मिली। यह स्वतंत्र भारत का पहला संत संगठन था, और इसके प्रथम अध्यक्ष तुकडोजी महाराज थे। 1956 से 1960 की वर्षावधि के समय उन्हें विभिन्न सम्मेलनों को संबोधित या संचालित करने के लिए आमंत्रित किया गया। 
उनका साहित्यिक योगदान बहुत अधिक और उच्च श्रेणी का है। उन्होंने हिंदी और मराठी दोनों ही भाषाओं में तीन हजार भजन, दो हजार अभंग, पांच हजार ओवीस के अलावा धार्मिक, सामाजिक, राष्ट्रीय और औपचारिक एवं अनौपचारिक शिक्षा पर छह सौ से अधिक लेख लिखे। वह कई सारी कलाओं और कौशलों के ज्ञाता रहे है। आध्यात्मिक क्षेत्र में वह एक महान योगी के रूप में जाने जाते थे, तो सांस्कृतिक क्षेत्र में उनकी प्रसिद्धि एक ओजस्वी वक्ता और संगीतज्ञ के रूप में थी। उनका व्यक्तित्व अतुलनीय और अद्वितीय था। उनके व्यक्तित्व के बहुत सारे पहलू थे एवं उनकी शिक्षाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए उपयोगी हैं। 
जीवन के अंतिम दिनों में राष्ट्रसंत तुकडोजी को कैंसर हो गया था। तब उस घातक बीमारी का उपचार करने के हर संभव प्रयास किए गए किन्तु कोई प्रयास सफल न हुआ। अंत में 11 अक्टूबर 1968 को  गुरुकुंज आश्रम में राष्ट्रसंत ने शरीर का त्याग कर ब्रह्मलीन हो गये। उनकी समाधि गुरुकुंज आश्रम के ठीक सामने स्थित है, जो सभी को कर्तव्य और निस्वार्थ भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान करती है।