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Gondia

Gondia: धान की फसल पर जंगली सुअरों का आतंक, कई हेक्टर फसल हुई बर्बाद


तिरोड़ा: किसानों ने रबी मौसम के लिए खेतों में धान की बुआई की है और उसमें अंकूर भी आ गए है. जिसे जंगली सुअर रौंदकर नुकसान पहुंचा रहे हैं. इससे किसानों की परेशानी बढ़ गई है. वहीं, किसानों को जंगली सुअर से जान का खतरा भी मंडराने लगा है. किसानों के इस धान की बुआई को इन दिनों जंगली सुअर नुकसान पहुंचा रहे हैं. पखवाड़े भर से क्षेत्र में जंगली सुअर आ रहे हैं और फसल को नुकसान पहुंचा रहे हैं. शाम होते ही सूअरों का झुंड खेतों की ओर पहुंचता हैं और बोई हुई धान की फसल को चौपट कर रहा हैं. 

किसानों ने बताया कि खेतों में रबी मौसम के लिए धान की बुआई की गई है उसमें अंकुर भी आ गए है. इस अवस्था में जंगली सुअर अंकुरित धान फसल को खाकर व रौंदकर नुकसान पहुंचा रहे है. वहीं खेत में अपने रहने का निवास बनाकर यहां पर रात में डेरा डालकर रहते है. जंगली सुअर के उपद्रव से धान बुआई का नुकसान हो रहा  है. ठंड के मौसम में किसान खेत की फसल की रखवाली नहीं कर सकता. यही फसल गर्मी के मौसम में हो तो वह रात में भी रातजागर कर लेता है. लेकिन कडाके की ठंड में यह असंभव है. जिन किसानों के खेतों में हलकी कम दिनों में तैयार होने वाली धान है उनका सुअर अधिक नुकसान करते है. 

संपूर्ण परिसर में कम दिनों में तैयार होने वाली धान कम प्रमाण में किसान लगाते है और यह धान सुअरों को खाने में मिठास लगने से व इन्हें अभी कम प्रमाण में खाने को मिलने से इन किसानों की फसलों पर तुड पडते है. धान की रोपाई होने के पहले सुअरों ने खेतों की मेड़ पर लगे हुए सुरण के कंद, कोचई कंद खोदकर खा गए. मेडों को खोदकर केचुआ गिली मिट‍्टी के अंदर रहते है वह खोदकर खा गए. जिन किसानों ने खेतों की मेडों पर तुअर फसल लगाई है इसमें केचुआं खोदकर निकालने के चक्कर में तुअर भी उखड़ कर सुख गई. 

इस वजह से किसानों ने तुअर बोना छोड‍़ दिया. सुअर पुरे मेडों को खोद डालते है. खेतों में तार, झिल्ली व सफेद खाली प्लास्टीक की बोरी पेडों पर लटकाई देखी जाती है व लोहे के तार खेतों के आस पास लगाए जाते है. इनके पांव को तार का स्पर्श होने से वह डर कर भागते है. ऐसी सोच किसानों की बनी हुई है. इसलिए वह यह सब तरकीबे किसान करता है. सफेद पट्टी, झिल्ली की जो रात में चमकते रहती है व सफेद रहने से सुअर इसे आदमी होगा यह सोच कर थोडा बहुत डरते है, फिर भी इन प्राणियों से फसल बचाना टेढी खिर है. इसलिए किसानों की कहावत है "फसल घर में आई तब अपनी कहना" यह कहावत यहां चरितार्थ हो रही है. 

यह जानवर अब बिना किसी डर के दिन में भी घुमते है. सरकार के ही जानवर नुकसान करते है. जबकि कानून नियम के तहत मुआवजा देने का तरीका तो तारीफे काबिल है. नुकसान होता है 10 हजार रु. का तथा  3 से 4 हजार रु. मुआवजा मिलता है. उसके लिए भी पटवारी, कृषि विभाग आदि के प्रमाणपत्र व कई तरह के दस्तावेज जमा करने पड़ते है इसके बाद भी 1 वर्ष तक राशि नहीं मिलती. किसानों की पुकार है कि  इन जंगली प्राणियों का उचित बंदोबस्त किया जाए या उन्हें पकड़कर रिजर्व जंगल परिसर में छोड दे  और किसानों को अपनी फसल का बगैर किसी डर के उत्पादन करने दें.