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Nagpur

निजी कोचिंग क्लासेस पर चलेगा सरकार का हंटर! मनमानी पर अंकुश लगाने के लिए महाराष्ट्र सरकार बनाएगी नियमावली


नागपुर: महाराष्ट्र में निजी कोचिंग क्लासेस (Private Coaching Institutes) के संचालन, उनकी बढ़ती फीस और कार्यप्रणाली को एक सुव्यवस्थित दायरे में लाने के लिए राज्य सरकार अब एक कड़ा और सकारात्मक कदम उठाने की तैयारी में है। शिक्षा राज्य मंत्री पंकज भोयर ने कहा कि, राज्य सरकार जल्द ही निजी कोचिंग क्लासेज के लिए नियमवाली लाने वाली है। नियमो को लेकर अध्ययन शुरू है।" 

ज्ञात हो कि, ट्यूशन फील को लेकर पिछले लंबे समय से पालकों और अभिभावकों की ओर से यह मांग बड़े पैमाने पर उठाई जा रही थी कि कमर्शियल कोचिंग सेंटर्स की मनमानी और अनियंत्रित फीस पर अंकुश लगाने के लिए कोई मजबूत सरकारी नियमावली (Rules and Regulations) होनी चाहिए। अभिभावकों की इस जायज चिंता और मांग का संज्ञान लेते हुए अब शासन स्तर पर इस दिशा में गंभीरता से विचार शुरू हो गया है।

शिक्षा राज्य मंत्री पंकज भोयर ने यह महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए बताया कि देश के अन्य राज्यों में निजी कोचिंग क्लासेस को रेगुलेट करने के लिए जो भी बेहतर और प्रभावी नियमावली पहले से लागू है, सरकार वर्तमान में उसका बारीकी से अध्ययन कर रही है। अन्य राज्यों के इसी प्रचलित मॉडल और नियमों का अभ्यास कर जल्द ही महाराष्ट्र में भी प्राइवेट कोचिंग सेंटर्स के लिए एक पारदर्शी नियमावली तैयार की जाएगी।

करोड़ों का खेल और 'हिडन चार्जेस' की माया
जब बात बच्चों के भविष्य की आती है, तो माता-पिता दुनिया की हर सुख-सुविधा दांव पर लगाने को तैयार हो जाते हैं। इसी भावुकता और कड़े कॉम्पिटिशन का फायदा उठाकर आज निजी कोचिंग का धंधा आसमान छू रहा है। आइए बिना किसी को व्यक्तिगत रूप से ठेस पहुंचाए, इस पूरे सिस्टम के गणित और इसकी कड़वी हकीकत को आंकड़ों के जरिए समझते हैं।

कितने हजार करोड़ का है यह पूरा कारोबार?
राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो भारत में कोचिंग इंडस्ट्री का सालाना टर्नओवर ₹30,000 करोड़ से ₹58,000 करोड़ के बीच आंका गया है। अगर सिर्फ महाराष्ट्र की बात करें तो,

  • राज्य के प्रमुख शिक्षा हब जैसे पुणे, नागपुर, लातूर, मुंबई और छत्रपति संभाजीनगर को मिलाकर यह बाजार अनुमानित रूप से ₹5,000 से ₹7,000 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार करता है।
  • अकेले मेडिकल (NEET) और इंजीनियरिंग (JEE) की दो साल की कोचिंग की फीस प्रति छात्र ₹2,00,000 से ₹3,50,000 तक पहुंच जाती है।  

किन-किन चीजों के नाम पर लिए जाते हैं पैसे? 
एडमिशन के वक्त जो फीस बताई जाती है, वह तो सिर्फ शुरुआत होती है। इसके बाद 'रसीद' और 'बिना रसीद' के नाम पर खर्चों की जो फेहरिस्त शुरू होती है, वह पालकों का बजट बिगाड़ कर रख देती है। अमूमन इन शीर्षकों के तहत पैसे वसूले जाते हैं, 

  • पंजीकरण और प्रशासनिक शुल्क (Registration & Admin Charges): एडमिशन प्रक्रिया शुरू करने के नाम पर ही एकमुश्त मोटी रकम ले ली जाती है, जो पूरी तरह से नॉन-रिफंडेबल (गैर-वापसी योग्य) होती है।
  • स्पेशलाइज्ड स्टडी मटेरियल (Study Material Cost): कोचिंग संस्थान दावा करते हैं कि उनकी खुद की किताबें ही सफलता की कुंजी हैं। इसके एवज में सामान्य किताबों से कई गुना अधिक कीमत वसूली जाती है।
  • मैंडेटरी टेस्ट सीरीज़ और असेसमेंट (Test Series Fees): साल भर चलने वाले वीकली या मंथली टेस्ट, ऑल इंडिया रैंक प्रेडिक्टर और सरप्राइज मॉक टेस्ट के नाम पर अलग से पैकेज बेचे जाते हैं। 
  • इन्फ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल एक्सेस लेवी (LMS & Technology Fees): डिजिटल इंडिया के इस दौर में ऑनलाइन पोर्टल, मोबाइल ऐप एक्सेस, रिकॉर्डेड लेक्चर्स (LMS) और क्लासरूम के सेंट्रलाइज्ड एसी (AC) का खर्च भी अप्रत्यक्ष रूप से फीस में जोड़ दिया जाता है। 
  • टैक्सेस और वन-टाइम प्रोसेसिंग (GST & Processing Fees): कोचिंग सेवाओं पर 18% GST लागू होता है। जब कुल फीस पर यह टैक्स जुड़ता है, तो रकम अचानक बहुत बड़ी हो जाती है। इसके अलावा किस्तों (EMI) में फीस देने पर प्रोसेसिंग चार्ज अलग से लगता है।  

'नो-रिफंड' पॉलिसी का जाल
सबसे ज्यादा तीखा अनुभव तब होता है, जब कोई छात्र किसी वजह से (तनाव या समझ न आने के कारण) बीच में ही कोचिंग छोड़ना चाहता है। अधिकांश बड़े संस्थान पूरी फीस एडवांस में जमा करा लेते हैं और बीच में पढ़ाई छोड़ने पर एक रुपया भी वापस नहीं करते, जिससे मध्यमवर्गीय परिवार पूरी तरह फंस जाता है। इसी बेलगाम होते आर्थिक बोझ और व्यावसायिक होड़ पर लगाम लगाने के लिए अब महाराष्ट्र सरकार एक कड़ा और संतुलित नियमन (नियमावली) लाने पर विचार कर रही है, ताकि शिक्षा की गरिमा भी बची रहे और पालकों की गाढ़ी कमाई की सुरक्षा भी हो सके।