'बच्चों को गूगल बाबा नहीं, दादा-दादी के हवाले करें': नागपुर में बोले RSS प्रमुख मोहन भागवत; 'भारतीय मनोविज्ञान' विकसित करने पर दिया जोर
नागपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत (Dr. Mohan Bhagwat) ने आज के आधुनिक दौर में बच्चों के मानसिक विकास और पारिवारिक मूल्यों को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने पालकों (माता-पिता) से अपील की है कि वे बच्चों के हाथों में मोबाइल थमाने के बजाय उन्हें दादा-दादी और नाना-नानी के पास छोड़ें। डॉ. भागवत ने स्पष्ट किया कि बच्चों के स्वाभाविक और प्राकृतिक मानसिक विकास के लिए यह बेहद जरूरी है।
वे नागपुर में 'सन्मार्ग माइंड वैलनेस नशामुक्ति एवं पुनर्वास केंद्र' के उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे। इस अवसर पर वर्धा जिले के पालकमंत्री पंकज भोयर भी विशेष रूप से उपस्थित थे।
'गूगल बाबा' बिगाड़ रहे हैं बच्चों का संतुलन
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. मोहन भागवत ने कहा, "पुराने समय में दादा-दादी या नाना-नानी अपने पोते-पोतियों को कहानियां सुनाकर अनजाने में ही संस्कार दे दिया करते थे, जिससे बच्चों में पारिवारिक मूल्यों की समझ पैदा होती थी। लेकिन आज के आधुनिक युग में संयुक्त परिवार की व्यवस्था बिखर रही है। कई बुजुर्गों को वृद्धाश्रमों में रहना पड़ रहा है। नतीजा यह है कि माता-पिता छोटे बच्चों को सीधे मोबाइल थमाकर उन्हें 'गूगल बाबा' के हवाले कर रहे हैं।" उन्होंने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि मोबाइल के अत्यधिक इस्तेमाल से बच्चों का संतुलन बिगड़ रहा है और उनका मानसिक विकास पूरी तरह से रुक जाता है।
कमजोर मन के कारण बढ़ रही हैं आत्महत्या जैसी घटनाएं
सरसंघचालक ने आज की युवा पीढ़ी में बढ़ती बेचैनी और गिरते मानसिक स्वास्थ्य पर तीखा दर्द व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का मुख्य साधन है। मनुष्य का तंत्रिका तंत्र (Nervous System) और विचार प्रक्रिया गर्भावस्था के दौरान ही विकसित होने लगती है और बाद के अनुभवों से मन का आकार तय होता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, "आज 12वीं में फेल होने पर आत्महत्या कर लेना या छोटी-छोटी बातों पर घर से भाग जाना जैसी घटनाएं आम हो गई हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि नई पीढ़ी में एक ऐसा मजबूत मन तैयार नहीं हो पा रहा है जो जीवन के संकटों का डटकर सामना कर सके।" उन्होंने कहा कि घर और समाज में सही संवाद (Communication) न होने के कारण बच्चों में अकेलापन बढ़ रहा है, और माता-पिता को इस अकेलेपन को दूर करने के लिए आगे आना चाहिए।
'मॉडर्न साइकोलॉजी' की सीमाएं और 'भारतीय मनोविज्ञान' की जरूरत
कार्यक्रम के दौरान डॉ. भागवत ने आधुनिक मनोविज्ञान की सीमाओं पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज की 'मॉडर्न साइकोलॉजी' मुख्य रूप से पश्चिमी देशों (Western Countries) से आई है। जबकि हमारे देश में सदियों पहले से 'पतंजलि योगसूत्र' और 'योगवासिष्ठ' जैसे महान ग्रंथों के माध्यम से मन का बेहद संपूर्ण और समग्र विश्लेषण मौजूद है, जिस पर दुर्भाग्य से हमारे यहां बहुत अधिक शोध नहीं हुआ।
उन्होंने अंत में कहा कि अगर वास्तव में मानव जाति का कल्याण करना है, तो पश्चिमी और भारतीय विचारों का गहराई से अध्ययन कर हमारे प्राचीन भारतीय शास्त्रों को जोड़ने वाला एक परिपूर्ण 'भारतीय मनोविज्ञान' (Indian Psychology) विकसित करने की आज देश को सबसे बड़ी आवश्यकता है।
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