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Amravati

Amravati: जिले की 574 ग्राम पंचायतों का कामकाज 'वेंटीलेटर' पर! कानूनी पेंच में फंसा प्रशासनिक और आर्थिक कारभार, गांवों में विकास कार्य पूरी तरह ठप


अमरावती: अमरावती जिले से ग्रामीण विकास और स्थानीय प्रशासन को लेकर एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आ रही है। जिले की जिन 574 ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और जहां आगामी दिसंबर महीने में चुनाव होने की संभावना है, वहां चुनाव से पहले ही एक बड़ा प्रशासनिक और आर्थिक गतिरोध पैदा हो गया है। राज्य सरकार ने इन ग्राम पंचायतों का कामकाज सुचारू रूप से चलाने के लिए निवर्तमान सरपंचों को ही बतौर प्रशासक नियुक्त किया था।

लेकिन सरकार के इस फैसले के खिलाफ बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई, जिसके बाद अदालत ने इन प्रशासक सरपंचों के आर्थिक लेन-देन और वित्तीय व्यवहारों पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। कोर्ट के इस कड़े रुख के कारण अमरावती जिले के ग्रामीण इलाकों में चल रहे तमाम महत्वपूर्ण विकास कार्य और बुनियादी परियोजनाएं पूरी तरह से ठप हो गई हैं, जिससे ग्रामीण व्यवस्था एक तरह से वेंटिलेटर पर आ गई है।

इस पूरे कानूनी विवाद के पीछे मुख्य वजह सरकार की कार्यप्रणाली को माना जा रहा है। जानकारों और कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि महज एक सरकारी अधिसूचना (Notification) के आधार पर निवर्तमान सरपंचों को दोबारा प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार देना पूरी तरह से गैर-कानूनी है। इसके लिए सरकार को बकायदा स्थापित कानून में संशोधन करना चाहिए था और राज्यपाल के जरिए अध्यादेश (Ordinance) जारी करवाना अनिवार्य था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

फिलहाल, अदालत के अंतरिम आदेश के मुताबिक ग्राम पंचायतों को केवल कर्मचारियों के वेतन, बिजली बिल के भुगतान और अत्यंत आवश्यक रोजमर्रा के खर्चों को निपटाने की ही अनुमति दी गई है, जबकि नए या बड़े विकास कार्यों के लिए फंड जारी करने पर पूरी तरह पाबंदी है।

इस बड़े प्रशासनिक गतिरोध और अव्यवस्था को लेकर अखिल भारतीय सरपंच परिषद और महाराष्ट्र राज्य सरपंच महासंघ ने ग्राम विकास विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों पर तीखे और गंभीर आरोप लगाए हैं। सरपंच महासंघ का कहना है कि इस संवेदनशील मुद्दे पर खुद मुख्यमंत्री और ग्राम विकास मंत्री का रुख बेहद सकारात्मक था और वे ग्रामीणों को राहत देना चाहते थे, लेकिन विभाग के आला अधिकारियों ने लापरवाही दिखाई।

अधिकारियों ने जल्दबाजी में कानूनी पहलुओं को दरकिनार करते हुए केवल एक साधारण अधिसूचना निकाल दी, जिसके कारण यह पूरा मामला अदालत में टिक नहीं सका और आज गांवों का विकास पूरी तरह रुक गया है। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार इस कानूनी पेंच को सुलझाने के लिए क्या नया कदम उठाती है।