नागपुर कांग्रेस में अध्यक्ष पद की जंग तेज: कल पहुंचेंगे केंद्रीय निरीक्षक, 5 दिनों तक चलेगा मंथन; दिग्गज गुटों में खींचतान शुरू
नागपुर: नागपुर शहर कांग्रेस अध्यक्ष को बदलने की सुगबुगाहट अब एक बड़े सियासी घमासान में बदल चुकी है। लंबे इंतजार के बाद आखिरकार पार्टी आलाकमान ने इस प्रक्रिया को गति दी है। शुक्रवार से कांग्रेस द्वारा नियुक्त केंद्रीय निरीक्षकों की टीम नागपुर के 5 दिवसीय दौरे पर आ रही है, जिसके बाद शहर अध्यक्ष के नाम पर मुहर लग सकती है।
निरीक्षकों का भारी-भरकम दल और चुनावी प्रक्रिया
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय निरीक्षक अरुण यादव, गोवा के राज्य प्रभारी माणिकराव ठाकरे, अशोक बोबड़े और जिया पटेल शुक्रवार को नागपुर पहुंच रहे हैं। यह टीम 5 दिनों तक शहर में डेरा डालेगी और विभिन्न गुटों व पदाधिकारियों के साथ बैठकें करेगी। बैठक के तुरंत बाद चुनाव की औपचारिक प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी।
विकास ठाकरे के उत्तराधिकारी की तलाश: ये नाम हैं रेस में
वर्तमान शहर अध्यक्ष और विधायक विकास ठाकरे के उत्तराधिकारी का चयन करना पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है। शहर में कांग्रेस के भीतर तीन मजबूत पक्ष (नगर अध्यक्ष, विधायक और लोकसभा उम्मीदवार) सक्रिय हैं।
- मुत्तेमवार गुट: चर्चा है कि विकास ठाकरे और विलास मुत्तेमवार गुट की ओर से विशाल मुत्तेमवार का नाम मजबूती से आगे बढ़ाया गया है।
- अन्य दावेदार: विधायक अभिजीत वंजारी और गिरीश पांडव भी अध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल हैं और उन्होंने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है।
- नितिन राउत गुट: पूर्व मंत्री नितिन राउत के खेमे से संजय दुबे और बंडोपंत टेंभुर्णे के नामों पर गंभीरता से चर्चा हो रही है।
- अन्य सक्रिय नेता: प्रदेश सचिव संदेश सिंगलकर, कमलेश समर्थ के समर्थक और आरएम खान नायडू भी अपनी-अपनी गोटियां बिछा रहे हैं।
रिटायर्ड अधिकारी भी रेस में
दिलचस्प बात यह है कि राजनीतिज्ञों के साथ-साथ सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हुए अनिल शाहू भी अपना बायोडाटा लेकर सक्रिय हो गए हैं, जिससे मुकाबला और भी रोचक हो गया है। असंगठित कामगार कांग्रेस के राष्ट्रीय समन्वयक राजेश निम्बालकर ने इस पूरी प्रक्रिया पर अपनी राय रखते हुए कहा कि कांग्रेस एक जन आंदोलन है। उन्होंने जोर दिया कि,"पार्टी की क्षमता बढ़ाने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। अध्यक्ष के चयन में केवल गुटबाजी नहीं, बल्कि आम जनता और जमीनी कार्यकर्ताओं की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए।"
5 दिनों के इस दौरे में गुटीय राजनीति और शक्ति प्रदर्शन चरम पर रहने वाला है। अब देखना यह होगा कि क्या निरीक्षक किसी एक नाम पर आम सहमति बना पाते हैं या फिर गुटों की यह खींचतान दिल्ली दरबार तक पहुंचेगी।
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