शिक्षण महर्षि पद्मश्री डॉ. डी. वाई. पाटिल का निधन, 90 वर्ष की आयु में ली अंतिम सांस; शिक्षा जगत में शोक की लहर
कोल्हापुर: देश के प्रतिष्ठित शिक्षाविद, पद्मश्री सम्मानित, बिहार और त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल तथा डी. वाई. पाटिल समूह के संस्थापक डॉ. ज्ञानदेव यशवंतराव (डी. वाई.) पाटिल का मंगलवार को कोल्हापुर में वृद्धावस्था के कारण निधन हो गया। वह 90 वर्ष के थे। सोमवार रात उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई थी। बुधवार को राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किए जाने की जानकारी सामने आई है। उनके निधन से शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल और सामाजिक क्षेत्र में शोक की लहर है।
किसान परिवार से निकलकर बने शिक्षा जगत का बड़ा नाम
22 अक्टूबर 1935 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के अंबाप गांव में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे डॉ. डी. वाई. पाटिल ने ग्रामीण क्षेत्रों तक गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा पहुंचाने को अपना जीवन समर्पित किया। उन्होंने शिक्षा को समाज परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम मानते हुए देशभर में शैक्षणिक संस्थानों का विशाल नेटवर्क खड़ा किया।
राजनीति से शिक्षा सेवा की ओर बढ़ाया कदम
डॉ. पाटिल ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस पार्टी से की। वर्ष 1957 से 1962 तक वे कोल्हापुर के महापौर रहे। इसके बाद 1967 और 1972 में पन्हाला विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए। बाद में उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बनाकर शिक्षा और समाज सेवा को अपना मुख्य कार्यक्षेत्र बनाया।
देशभर में खड़ा किया शिक्षा संस्थानों का विशाल नेटवर्क
वर्ष 1983 में नवी मुंबई में रामराव आदिक इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (RAIT) की स्थापना के साथ उन्होंने अपने शैक्षणिक अभियान की शुरुआत की। आज डी. वाई. पाटिल समूह के अंतर्गत कोल्हापुर, पुणे, नवी मुंबई सहित देश के विभिन्न हिस्सों में डीम्ड विश्वविद्यालय, निजी विश्वविद्यालय और 180 से अधिक शैक्षणिक संस्थान संचालित हो रहे हैं। इन संस्थानों में इंजीनियरिंग, मेडिकल, डेंटल, फार्मेसी, मैनेजमेंट, नर्सिंग, कृषि, आर्किटेक्चर और विधि सहित अनेक विषयों में हजारों विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
बिहार और त्रिपुरा के राज्यपाल भी रहे
शिक्षा क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के साथ उन्होंने संवैधानिक जिम्मेदारियां भी निभाईं। वर्ष 2009 से 2013 तक वे त्रिपुरा के राज्यपाल रहे। इसके बाद 2013 से 2014 तक उन्होंने बिहार के राज्यपाल के रूप में कार्य किया। इस दौरान कुछ समय के लिए उन्होंने पश्चिम बंगाल के राज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार भी संभाला।
नवी मुंबई स्थित विश्वस्तरीय डॉ. डी. वाई. पाटिल स्टेडियम उनकी दूरदृष्टि का प्रतीक माना जाता है। इस स्टेडियम में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट, आईपीएल, फुटबॉल सहित कई बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आयोजन हुए। इसके अलावा मेडिकल कॉलेजों, अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों के माध्यम से उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पद्मश्री सहित कई सम्मान से हुए सम्मानित
शिक्षा और समाज सेवा में उत्कृष्ट योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 1991 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। इसके अलावा देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद डॉक्टरेट और डी.लिट. की उपाधियों से भी सम्मानित किया।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने जताया शोक
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने डॉ. डी. वाई. पाटिल के निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने शिक्षा, चिकित्सा, खेल और सामाजिक क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया। सामान्य कार्यकर्ता से राज्यपाल तक का उनका सफर प्रेरणादायी रहा। उन्होंने कहा कि डॉ. पाटिल के निधन से देश ने एक दूरदर्शी शिक्षाविद और समाजसेवी को खो दिया है।
उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा कि डॉ. डी. वाई. पाटिल ने शिक्षा को नई दिशा दी और ‘अकादमिक एक्सीलेंस’ तथा ‘होलिस्टिक एजुकेशन’ की अवधारणा को मजबूत किया। उन्होंने कहा कि उनके द्वारा स्थापित विश्वविद्यालयों, अस्पतालों और विश्वस्तरीय खेल सुविधाओं ने देश की पहचान बढ़ाई है।
डॉ. डी. वाई. पाटिल के निधन को शिक्षा जगत के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। ग्रामीण भारत में उच्च शिक्षा का विस्तार करने और लाखों विद्यार्थियों के भविष्य को नई दिशा देने के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा।
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