नेताओं की दुश्मनी खत्म, अब कार्यकर्ता करें क्या? ‘दुश्मनी जमकर करो.. पर..’ बशीर बद्र का शेर चंद्रपुर की राजनीति पर सटीक!
- पवन झबाडे
"दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।" बशीर बद्र ने यह शेर शायद नेताओं की राजनीति को ध्यान में रखकर ही लिखा होगा, ऐसा सवाल चंद्रपुर की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को देखकर उठता है। एक-दूसरे की सरेआम खिल्ली उड़ाना, आरोपों की बौछार करना, समर्थकों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करना और वक्त आते ही मुस्कुराते हुए हाथ मिला लेना! राजनीति में नेताओं की दोस्ती और दुश्मनी, दोनों ही सुविधानुसार तय होती हैं। लेकिन इस पूरे खेल में सबसे ज्यादा असमंजस कार्यकर्ताओं की होती है।
विधायक विजय वडेट्टीवार और सांसद प्रतिभा धानोरकर के बीच का राजनीतिक संघर्ष किसी से छिपा नहीं है। लोकसभा चुनाव के टिकट से शुरू हुआ विवाद कई बार सार्वजनिक रूप से सामने आया। दोनों ओर से एक-दूसरे को निशाना बनाया गया। समर्थकों ने भी अपने-अपने नेता के लिए इसे प्रतिष्ठा की लड़ाई बना लिया। पार्टी के भीतर विरोधियों को घेरते समय शायद किसी ने यह नहीं सोचा होगा कि कल इन्हीं लोगों के साथ बैठने की नौबत भी आ सकती है। कुछ समय पहले तमाम विवादों को भुलाकर जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक के चुनाव के दौरान एकादशी के दिन भगवान विठ्ठल के सामने दोनों नेता एक साथ आए। विठ्ठल के दरबार में दोनों के बीच राजनीतिक मनमुटाव दूर होता नजर आया।
इसके बाद महानगरपालिका की राजनीति में एक बार फिर विवाद की चिंगारी भड़क उठी। दोनों पक्षों के बीच टकराव इतना बढ़ गया कि मामला पुलिस और अदालत तक पहुंच गया। कई लोगों को लगा होगा कि अब यह संघर्ष निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। लेकिन राजनीति में आखिरी अंक कब आएगा, यह कार्यकर्ताओं को कभी समझ नहीं आता। नवरात्रि के अवसर पर दोनों नेता एक बार फिर साथ आ गए और राजनीतिक घटनाक्रम ने नया मोड़ ले लिया। अब सबसे बड़ी उलझन कार्यकर्ताओं के सामने है। कल तक जिन नेताओं पर आरोप लगाए एक-दूसरे से भिड़ंत हुई, आज उन्हीं नेताओं के साथ अपने नेता को हाथ मिलाते देख कार्यकर्ता आखिर क्या करें? कल तक जिस नेता का विरोध किया, आज उसे भूल जाएं और दोस्ती का स्वागत करें? ऐसे कई सवाल उन्हें परेशान कर रहे हैं।
राजनीति में नेताओं के लिए विरोध एक रणनीति होता है, जबकि दोस्ती कई बार जरूरत बन जाती है। लेकिन कार्यकर्ताओं के लिए यह भावनाओं और निष्ठा का सवाल होता है। नेता राजनीतिक समीकरणों के अनुसार करीब आते हैं, दूर जाते हैं और फिर एक साथ हो जाते हैं। उनके हर राजनीतिक मोड़ पर कार्यकर्ताओं को अपनी निष्ठा का झंडा कंधे पर उठाकर दौड़ते रहना पड़ता है।
आखिरकार नेताओं के बीच विवाद खत्म हुआ, हाथ मिल गए और राजनीतिक मनमुटाव दूर हो गया। लेकिन कार्यकर्ताओं का क्या? नेताओं की दोस्ती और दुश्मनी बदलती रहती है, मगर कार्यकर्ताओं को अपनी कल की बातों और आज की हकीकत के बीच तालमेल बैठाना पड़ता है। नेता दोस्त बन जाते हैं तो उन्हें शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं पड़ती, लेकिन शर्मिंदगी की स्थिति उनके निष्ठावान कार्यकर्ताओं के सामने खड़ी हो जाती है।विजय वडेट्टीवार और प्रतिभा धानोरकर के राजनीतिक मेल-मिलाप ने एक बार फिर यही सवाल खड़ा किया है। नेताओं की दोस्ती हो गई, लेकिन कार्यकर्ता अब क्या करें?
admin
News Admin