विजय वडेट्टीवार आलाकमान के नियंत्रण से हुए बाहर! कांग्रेस प्रभारी रमेश चेन्निथला के दावे को झुठलाया, कार्रवाई का दावा या सिर्फ हवा-हवाई बातें?
नागपुर/ चंद्रपुर: कहते हैं ना 'चित भी मेरी, पट भी मेरी और अंगूठा मेरे बाप का', इसी कहावत का अनुभव फिलहाल चंद्रपुर में देखने को मिल रहा है। चंद्रपुर में कांग्रेस के दो बड़े नेताओं की आपसी कलह के कारण महापौर की कुर्सी भाजपा की झोली में जा गिरी, लेकिन हार की जिम्मेदारी लेने के बजाय वहां के दिग्गज कहलाने वाले नेता अब पल्ला झाड़ते नजर आ रहे हैं।
चंद्रपुर महानगर पालिका चुनाव में जनता ने कांग्रेस को जनादेश दिया था। लेकिन कहते हैं ना कि 'किस्मत मेहरबान तो गधा पहलवान', मगर यहाँ तो 'भगवान देता है और कर्म ले जाता है' वाली स्थिति कांग्रेस की हो गई। महापौर पद और स्थायी समिति को लेकर विजय वडेट्टीवार और प्रतिभा धानोरकर के बीच जमकर खींचतान चली। आखिरी वक्त में भाजपा ने इस आपसी विवाद का फायदा उठाने का मौका नहीं गंवाया। जो ठाकरे गुट के पार्षद कांग्रेस को समर्थन देने वाले थे, उन्होंने पाला बदलकर भाजपा का साथ दे दिया।
सुधीर मुनगंटीवार के नेतृत्व में भाजपा-ठाकरे सेना की सत्ता स्थापित हुई और कांग्रेस चारों खाने चित हो गई। इसके बाद यह मामला कांग्रेस प्रभारी तक पहुँचा, बैठक हुई, वडेट्टीवार-धानोरकर विवाद पर चर्चा भी हुई, लेकिन प्रभारी रमेश चेन्निथला ने सारा ठीकरा ठाकरे की शिवसेना पर फोड़ दिया। हालांकि, वडेट्टीवार का दावा है कि बैठक में ऐसी कोई चर्चा ही नहीं हुई।
अब सवाल यह उठता है कि क्या वडेट्टीवार झूठ बोल रहे हैं? ऐसा इसलिए क्योंकि बैठक खत्म होते ही कांग्रेस प्रभारी रमेश चेन्निथला ने खुद कहा था कि चंद्रपुर के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई है। यानी एक तरफ चेन्निथला कह रहे हैं कि चर्चा हुई, तो दूसरी तरफ वडेट्टीवार कह रहे हैं कि कोई चर्चा नहीं हुई। अब वडेट्टीवार का यह दावा कि पार्टी ने उन्हें फटकार नहीं लगाई है, क्या केवल अपनी साख बचाने की कोशिश है? यह सवाल अब बड़ा बवाल खड़ा कर रहा है।
अब चंद्रपुर के इस राजनीतिक घटनाक्रम पर UCN न्यूज कुछ सवाल उठा रहा है, आइए देखते हैं...
- जो चंद्रपुर में भाजपा ने कर दिखाया, वो कांग्रेस क्यों नहीं कर पाई?
- जोरगेवार-मुनगंटीवार के बीच विवाद होने के बावजूद वे सत्ता बनाने में कैसे सफल रहे?
- क्या कांग्रेस आलाकमान अपने दो नेताओं का आपसी विवाद भी नहीं सुलझा सकता?
- जो अनुशासन भाजपा में दिखता है, वो कांग्रेस में क्यों गायब है?
- सामने रखी सत्ता को हासिल करना कांग्रेस को क्यों नहीं जम रहा?
- क्या कांग्रेस ने चंद्रपुर में मिले जनादेश का अपमान किया है?
कांग्रेस का कहना है कि महाविकास अघाड़ी में शामिल ठाकरे की शिवसेना ने कांग्रेस का हाथ छोड़कर भाजपा के कमल का साथ दिया, इसलिए यह नौबत आई। सत्ता तो हाथ से गई ही, लेकिन अपनी गलती मानने के बजाय जिम्मेदार नेता अब जिम्मेदारी से भाग रहे हैं। ऐसे में भविष्य में कांग्रेस की सत्ता बनाने की काबिलियत पर बड़े प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं।
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