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नागपुर के गणेशोत्सव पर कमर्शियल कल्चर का ग्रहण: भव्यता की अंधी दौड़ और वीआईपी दर्शन के नाम पर खुली लूट


नागपुर: गणेशोत्सव आस्था, श्रद्धा और बप्पा के सान्निध्य का वह पवित्र पर्व, जो कभी हर दिल में एक जैसी उमंग जगाता था, अब आधुनिकता और व्यावसायिकता की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। एक समय था जब छोटे से लेकर बड़े गणेश पंडालों में भक्तों की भीड़ सिर्फ बप्पा के दर्शन और उनकी आराधना के लिए उमड़ती थी। अमीर हो या गरीब, हर कोई एक ही कतार में खड़े होकर बाप्पा का आशीर्वाद लेता था। लेकिन बदलते दौर के साथ अब नागपुर शहर में गणेशोत्सव का यह पावन स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। अब यह धर्म और संस्कृति से ज्यादा व्यापार, कमाई और शो-ऑफ (दिखावे) का बड़ा जरिया बनता जा रहा है।

नागपुर के कई बड़े और प्रसिद्ध गणेश मंडलों में इन दिनों 'वीआईपी दर्शन' और 'स्पेशल एंट्री' के नाम पर खुलेआम पैसे वसूले जा रहे हैं। पंडालों के बाहर या विशेष द्वारों पर भक्तों की आस्था का सौदा किया जा रहा है, जहां दर्शन के एवज में कहीं 50, कहीं 100 तो कहीं 300 रुपये तक वसूले जा रहे हैं। यह चिंताजनक प्रवृत्ति अब केवल बड़े मंडलों तक सीमित नहीं रही, बल्कि छोटे मंडलों में भी पैर पसारती जा रही है, जिससे आम और गरीब भक्त खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं।

करोड़ों के बजट और यूनिक थीम की अंधी दौड़

जैसे-जैसे समय बदल रहा है, पंडालों की भव्यता और आधुनिकता का स्तर आसमान छू रहा है। आज के समय में बप्पा की स्थापना भक्ति भाव से ज्यादा 'प्रतिष्ठा' का विषय बन गई है। पंडालों के निर्माण और सजावट पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है, और कई प्रमुख मंडलों का बजट करोड़ों रुपये तक पहुंच जाता है।

हर साल भक्तों को आकर्षित करने के लिए अलग-अलग और भव्य 'यूनिक थीम' पर पंडाल सजाए जाते हैं। आधुनिक लाइटिंग, रोबोटिक तकनीक और महंगे सेट डिजाइनिंग के जरिए पंडालों को किसी माया नगरी की तरह पेश किया जाता है। इस भव्यता को तैयार करने में आने वाले भारी-भरकम खर्च को वसूलने के लिए ही शायद अब आयोजकों द्वारा दर्शन को भी कमाई का जरिया बनाया जाने लगा है।

सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और वायरल होने का खेल

आज के डिजिटल और रील्स के दौर में किसी भी पंडाल को रातों-रात चर्चा में लाने के लिए सोशल मीडिया 'इन्फ्लुएंसर्स' की भूमिका सबसे अहम हो गई है। आयोजक अब महंगे दामों पर इन इन्फ्लुएंसर्स को हायर करते हैं, जो अपनी रील्स और वीडियो के जरिए पंडाल की भव्यता को इंटरनेट पर वायरल कर देते हैं।

जब ये वीडियो सोशल मीडिया पर ट्रेंड करते हैं, तो नागपुर समेत आसपास के जिलों से हजारों की संख्या में भीड़ उमड़ने लगती है। भारी भीड़ और सोशल मीडिया के इस क्रेज का फायदा उठाकर मंडलों में अराजकता और व्यावसायीकरण अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाता है।

भीड़ बढ़ी तो शुरू हुआ 'वीवीआईपी पास' और वसूली का धंधा

जब इन्फ्लुएंसर्स के प्रचार के कारण पंडालों में पैर रखने की जगह नहीं बचती और आम जनता घंटों लंबी लाइनों में खड़ी रहती है, तब शुरू होता है वीवीआईपी पास और पैसों का खेल। जो लोग कतार में खड़े होने से बचना चाहते हैं या तुरंत दर्शन करना चाहते हैं, उनसे काउंटर पर पैसे लेकर 'विशेष पास' थमा दिए जाते हैं।

लाखों भक्तों की आस्था के इस केंद्र पर इस तरह का भेद-भाव और पैसों के बल पर जल्दी दर्शन कराना, क्या वाकई धर्म है या शुद्ध व्यापार?  जिस दरबार में राजा और रंक एक समान होने चाहिए, वहां आज पैसे वालों के लिए रेड कारपेट और आम श्रद्धालुओं के लिए घंटों की जिल्लत क्यों? समय आ गया है कि समाज और जिला प्रशासन इस कमर्शियल कल्चर पर लगाम कसे, ताकि गणेशोत्सव की पवित्रता और उसकी मूल गरिमा को बचाया जा सके।