11 साल बाद 'कोल स्कैम' में विजय दर्डा, मनोज जायसवाल समेत सभी आरोपी बरी, CBI की पहली चार्जशीट में नहीं टिक पाए आरोप
नागपुर: कोल घोटाला मामले में राऊज एवेन्यू कोर्ट (RADC) से मनोज जायसवाल (Manoj Jaisawal) समेत पूर्व सांसद विजय दर्डा (Vijay Darda) और उनके परिवार के लिए बड़ी राहत की खबर आई है। स्पेशल जज सुनैना शर्मा (Sunaina Sharma) ने बहुचर्चित कोल ब्लॉक आवंटन मामले (Coal Block Allocation Cases) में पूर्व राज्यसभा सांसद विजय दर्डा, उनके बेटे देवेंद्र दर्डा, मनोज कुमार जायसवाल, मेसर्स AMR आयरन एंड स्टील प्राइवेट लिमिटेड और तत्कालीन सरकारी कर्मचारी एच.सी. गुप्ता को सभी आरोपों से बाइज्जत बरी कर दिया है।
11 साल लंबा ट्रायल और CBI की पहली चार्जशीट
यह मामला कानूनी और राजनीतिक गलियारों में इसलिए भी चर्चा का विषय था क्योंकि यह कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा दायर की गई पहली चार्जशीट थी। करीब 11 साल तक चले लंबे कानूनी ट्रायल के बाद कोर्ट ने पाया कि आरोपियों के खिलाफ लगाए गए धोखाधड़ी और साजिश के सबूत पर्याप्त नहीं थे।
क्या थे मुख्य आरोप?
मेसर्स AMR आयरन एंड स्टील प्राइवेट लिमिटेड ने 'बंदर कोल ब्लॉक' हासिल करने के लिए कोयला मंत्रालय को गलत जानकारी देकर सरकार को धोखा दिया। तत्कालीन कोयला सचिव एच.सी. गुप्ता के साथ मिलकर साजिश रची गई। पूर्व सांसद विजय दर्डा ने अपने पद का प्रभाव इस्तेमाल करते हुए कंपनी को फायदा पहुँचाने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को पत्र लिखे थे। एजेंसी ने इसमें करीब 24.6 करोड़ रुपये के कथित भ्रष्टाचार का दावा किया था।
कोर्ट का फैसला: 'धोखाधड़ी का कोई इरादा नहीं'
स्पेशल जज सुनैना शर्मा ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड के आधार पर आरोपियों का कोई भी 'बेईमानी' या 'धोखाधड़ी' का इरादा साबित नहीं होता है। कोर्ट ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण बिंदु रखे:
- आवंटन प्रक्रिया के दौरान अधिकारियों के पास कंपनी से संबंधित सभी जरूरी और सही जानकारी मौजूद थी।
- किसी भी गवाह ने कोर्ट में धोखाधड़ी या लालच के आरोपों का समर्थन नहीं किया।
- 24.6 करोड़ रुपये के कथित भ्रष्टाचार और साजिश के आरोप पूरी तरह निराधार पाए गए।
- विजय दर्डा द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्रों में भी किसी भी प्रकार की गड़बड़ी या गलत मंशा का जिक्र नहीं मिला।
मजबूत कानूनी पैरवी
इस केस में विजय दर्डा, देवेंद्र दर्डा और संबंधित कंपनी की ओर से एडवोकेट मुदित जैन ने मजबूती से पक्ष रखा, जबकि एडवोकेट युगांत शर्मा भी आरोपियों की तरफ से पेश हुए। वकीलों की दलीलों ने यह साबित करने में मदद की कि आवंटन प्रक्रिया पारदर्शी थी और इसमें किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं किया गया था।
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