भाजपा में फैसला कौन लेगा, मेयर चयन बना सियासी सिरदर्द? भाजपा उद्धव गुट में सवा-सवा साल का नया फॉर्मुला सामने
-पवन झबाडे
चंद्रपुर: चंद्रपुर महानगरपालिका में जारी सत्ता संघर्ष के बीच अब एक नया और चौंकाने वाला राजनीतिक फॉर्मूला सामने आ रहा है। राज्य स्तर पर भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के बीच तीखा राजनीतिक टकराव देखने को मिल रहा है, लेकिन चंद्रपुर में इसके विपरीत तस्वीर उभरती नजर आ रही है।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, चंद्रपुर महानगरपालिका में भाजपा और शिवसेना (उबाठा) के बीच सवा साल के मेयर पद के फॉर्मूले को लेकर बातचीत शुरू होने की चर्चा है। हालांकि, इस संभावित राजनीतिक तालमेल के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि भाजपा की ओर से अंतिम फैसला लेने का अधिकार किसके पास होगा।
भाजपा के भीतर दो पावर सेंटर
चंद्रपुर मनपा में भाजपा के 23 नगरसेवक निर्वाचित हुए हैं, जबकि शिवसेना (शिंदे गुट) का एक नगरसेवक भाजपा गुट में शामिल किया गया है। इस तरह भाजपा ने कुल 24 नगरसेवकों का आधिकारिक गुट पंजीकृत किया है।
गुटनेता पद आमदार किशोर जोरगेवार के करीबी नगरसेवक को दिए जाने के बाद यह संकेत मिले थे कि सत्ता की चाबी जोरगेवार गुट के हाथ में होगी। लेकिन अब तस्वीर बदलती नजर आ रही है।
सूत्रों के मुताबिक, मेयर चयन से जुड़े अधिकार विधायक सुधीर मुनगंटीवार के पास होने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे में गुटनेता पद भले ही विधायक किशोर जोरगेवार समर्थकों के पास हो, लेकिन मुनगंटीवार की सहमति के बिना मेयर के नाम पर मुहर लगना मुश्किल माना जा रहा है।
भाजपा में अंदरूनी तनाव बढ़ा
इस घटनाक्रम से भाजपा के आंतरिक राजनीतिक हलकों में असमंजस और तनाव की स्थिति पैदा हो गई है। जोरगेवार गुट मेयर पद के लिए सक्रिय रूप से प्रयास कर रहा है, लेकिन मुनगंटीवार की भूमिका निर्णायक होने से पार्टी के भीतर संतुलन को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
शिवसेना (उबाठा) की सतर्क रणनीति
दूसरी ओर, शिवसेना (उबाठा) ने भी फिलहाल सतर्क और प्रतीक्षात्मक रुख अपनाया है। भाजपा में अंतिम निर्णय कौन लेगा और बातचीत में किसका प्रभाव रहेगा, यह स्पष्ट न होने के कारण उबाठा गुट किसी भी जल्दबाजी से बचता नजर आ रहा है।
आगे क्या?
एक तरफ भाजपा–शिवसेना (उबाठा) के बीच संभावित सवा साल का मेयर फॉर्मूला, तो दूसरी ओर भाजपा के भीतर ही उभरता अधिकार संघर्ष — इन दोनों कारणों से चंद्रपुर महानगरपालिका में सत्ता गठन की प्रक्रिया और अधिक जटिल होती जा रही है।
भाजपा किस रणनीति के तहत आगे बढ़ती है, निर्णय का अधिकार किसके पास रहता है और क्या शिवसेना (उबाठा) के साथ यह राजनीतिक समझौता वास्तविकता में बदलता है, इस पर राजनीतिक गलियारे की नजरें टिकी हुई हैं।
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