महाराष्ट्र विधान परिषद: शिवसेना नेता सचिन अहीर निर्विरोध चुने गए उपसभापति; CM फडणवीस और DCM शिंदे ने दी बधाई
मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। शिवसेना (शिंदे गुट) के वरिष्ठ नेता और विधायक सचिन अहीर को बुधवार (1 जुलाई 2026) को एकमत से विधान परिषद का नया उपसभापति चुन लिया गया है। महायुती के उम्मीदवार के रूप में सचिन अहीर मैदान में थे, जबकि विपक्ष (महाविकास अघाड़ी) की तरफ से उद्धव गुट के जगन्नाथ अभ्यंकर ने पर्चा भरा था। हालांकि, सदन की गौरवशाली परंपरा और सर्वसम्मति को बनाए रखने के लिए महाविकास अघाड़ी ने ऐन वक्त पर अपना नामांकन वापस ले लिया, जिसके बाद ध्वनि मत (Voice Vote) के जरिए सचिन अहीर के नाम पर मुहर लगा दी गई। इस दौरान मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे समेत महायुती और विपक्ष के तमाम दिग्गज नेता सदन में मौजूद रहे।
संसदीय परंपरा के लिए विपक्ष ने दिखाई उदारता
विधान परिषद में आंकड़ों के खेल को देखा जाए तो महायुती (गठबंधन) के पास ५६ से ज्यादा विधायकों का भारी समर्थन था, जिससे उनका जीतना पहले से ही तय माना जा रहा था। इसके बावजूद, संसदीय परंपराओं का सम्मान करने के लिए मंत्री चंद्रकांत पाटिल ने विपक्षी दलों से उम्मीदवार का नाम वापस लेने की अपील की। इस अपील का मान रखते हुए उद्धव गुट के वरिष्ठ नेता अनिल परब ने सदन में घोषणा की, "चूंकि पूरा सदन चाहता है कि यह चुनाव सर्वसम्मति से हो, इसलिए हम अपना उम्मीदवारी अर्ज वापस ले रहे हैं।" इस घोषणा के तुरंत बाद अहीर के निर्विरोध निर्वाचन का रास्ता साफ हो गया।
'सचिन अहीर निडर और न्यायप्रिय उपसभापति साबित होंगे'- देवेंद्र फडणवीस
नवनिर्वाचित उपसभापति का अभिनंदन करते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने विपक्ष की सराहना की और सचिन अहीर के साथ अपने पुराने रिश्तों को याद किया। फडणवीस ने कहा, "मैं विपक्षी दलों का आभार व्यक्त करता हूं जिन्होंने सदन की गरिमा रखते हुए पर्चा वापस लिया। सचिन अहीर और मैं, दोनों साल 1999 में पहली बार एक साथ विधानसभा के लिए चुने गए थे। 'अहीर' शब्द का अर्थ ही गोपालक और निडर होता है। वे बेहद साहसी और जमीनी नेता हैं। उपसभापति की कुर्सी पर बैठने के बाद हर सदस्य को समान न्याय देना होता है, और मुझे पूरा विश्वास है कि सचिन इस जिम्मेदारी को बेहद सक्षमता से निभाएंगे।"
मुख्यमंत्री ने पूर्व उपसभापति नीलम गोऱ्हे के कार्यकाल की भी जमकर तारीफ की और कहा कि उन्होंने चुनौतीपूर्ण समय में भी सदन की प्रतिष्ठा को बनाए रखा। इसके साथ ही उन्होंने एक बड़ा राजनीतिक बयान देते हुए स्पष्ट किया कि सचिन अहीर जब विधान परिषद में चुनकर आए थे, तब वे 'धनुष-बाण' चिन्ह पर ही आए थे, इसलिए तकनीकी रूप से उन्होंने कोई दल नहीं बदला है।
'एक सचिन रिटायर हुआ, दूसरा मैदान फतह करने को तैयार'- शिंदे
उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने अपने चिरपरिचित मजाकिया और बेबाक अंदाज में सचिन अहीर को बधाई दी। उन्होंने क्रिकेट का उदाहरण देते हुए कहा, "हर खिलाड़ी की अपनी एक अलग स्टाइल होती है। इनकी तो नाम में ही सचिन है! एक सचिन (तेंदुलकर) देश का नाम दुनिया भर में रौशन करके रिटायर हुआ, और अब यह दूसरा सचिन पैड बांधकर नई पारी की शुरुआत करने मैदान में उतर चुका है। यह सचिन भी अपनी पारी से मैदान गाड़ने को पूरी तरह तैयार है।" शिंदे ने आगे कहा कि सचिन अहीर में हमने केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि एक सच्चा समाजशास्त्री देखा है। वे मिल मजदूरों और कामगार आंदोलन से निकले हुए नेता हैं, जिनका हजारों गरीबों के दिलों से सीधा जुड़ाव है।
इन 4 वजहों से सचिन अहीर ने थामा 'शिंदे गुट' का दामन?
सियासी गलियारों में चर्चा है कि उद्धव गुट से अचानक शिंदे सेना में आकर उपसभापति बनने के पीछे अहीर की सोची-समझी राजनीतिक रणनीति काम कर रही थी।
- विधान परिषद का सुरक्षित भविष्य: अहीर का विधान परिषद कार्यकाल साल 2028 तक है। मौजूदा समय में उद्धव गुट के पास विधानसभा में संख्या बल बेहद कम है, जिससे भविष्य में उनका दोबारा चुनकर आना मुश्किल था।
- वरली विधानसभा के रास्ते बंद: सचिन अहीर का मुख्य कार्यक्षेत्र मुंबई का 'वरली' निर्वाचन क्षेत्र रहा है। लेकिन वहां से खुद आदित्य ठाकरे चुनाव लड़ते हैं, जिससे उनके लिए विधानसभा के दरवाजे पूरी तरह बंद थे।
- उपसभापति पद का बड़ा ऑफर: शिंदे गुट ने उनके राजनीतिक पुनर्वास के लिए सीधे विधान परिषद के दूसरे सबसे बड़े और प्रतिष्ठित 'उपसभापति' पद की पेशकश की, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया।
- संजय दीना पाटिल का असर: कुछ दिन पहले ही उद्धव गुट के सांसद संजय दीना पाटिल ने शिंदे गुट में प्रवेश किया था। वे अहीर के बेहद करीबी दोस्त हैं, जिसने अहीर के फैसले को अंतिम रूप देने में मदद की।
क्या है उपसभापति पद का संवैधानिक महत्व?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 182 (Article 182) के तहत जिन राज्यों में विधान परिषद है, वहां एक सभापति और एक उपसभापति का चुना जाना अनिवार्य है। कुल 78 सदस्यों वाले महाराष्ट्र के इस उच्च सदन में सभापति की अनुपस्थिति के दौरान सदन का कामकाज संभालना, अनुशासन बनाए रखना और संसदीय नियमों का पालन कराना उपसभापति के मुख्य अधिकार क्षेत्र में आता है।
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