नक्सलवाद का अंत करीब: 1.5 करोड़ के इनामी 'मास्टरमाइंड' देवजी और मल्लराजी रेड्डी का सरेंडर; माओवादी संगठन अब 'लीडरलेस'
गडचिरोली: भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को पिछले चार दशकों से चकमा दे रहे नक्सली आंदोलन के 'सुप्रीम कमांडर' और माओवादी संगठन के जनरल सेक्रेटरी देवजी उर्फ थिप्पारी तिरुपति ने अंततः हथियार डाल दिए हैं। मिली जानकारी के अनुसार, देवजी ने अपने कट्टर सहयोगी और सेंट्रल कमेटी सदस्य मल्लराजी रेड्डी उर्फ संग्राम समेत 16 अन्य नक्सलियों के साथ तेलंगाना पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। देवजी पर 1.5 करोड़ और संग्राम पर 1 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था। इस सरेंडर के साथ ही देश में नक्सली आंदोलन की रीढ़ पूरी तरह टूट गई है।
दंतेवाड़ा हमले का मास्टरमाइंड अब पुलिस की गिरफ्त में
64 वर्षीय देवजी को नक्सलवाद का सबसे बड़ा रणनीतिकार माना जाता है। वह छत्तीसगढ़ के उस वीभत्स दंतेवाड़ा हमले का मुख्य सूत्रधार था, जिसमें 76 जवान शहीद हुए थे। मई 2025 में बसवा राजू की मौत के बाद देवजी ने संगठन की कमान संभाली थी। तेलंगाना के जगतियाल से ताल्लुक रखने वाले देवजी ने 1983 में पीपल्स वॉर ग्रुप से अपना सफर शुरू किया था और गोवा से केरल तक नक्सलवाद को फैलाने में अहम भूमिका निभाई थी।
मौत की अफवाहों पर लगा विराम
ओडिशा स्टेट कमेटी के पूर्व सेक्रेटरी मल्लराजी रेड्डी उर्फ 'संग्राम' के सरेंडर ने सभी अटकलों पर विराम लगा दिया है। साल 2023 में खबर उड़ी थी कि बीमारी के कारण संग्राम की मौत हो गई है, लेकिन आज भारी मात्रा में हथियारों के साथ उनके आत्मसमर्पण ने सुरक्षा बलों को चौंका दिया। संग्राम 1975 से इस आंदोलन में सक्रिय थे और उन्हें संगठन का सबसे अनुभवी चेहरा माना जाता था।
ऑपरेशन का असर: ताश के पत्तों की तरह ढहा संगठन
पिछले डेढ़ साल में सुरक्षा बलों की आक्रामक नीति ने नक्सलियों को बैकफुट पर धकेल दिया है:
- 21 मई 2025: एनकाउंटर में टॉप लीडर बसव राजू की मौत।
- 15 अक्टूबर 2025: नंबर-2 लीडर भूपति का महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के सामने सरेंडर।
- 18 नवंबर 2025: दुर्दांत मिलिट्री कमांडर माडवी हिडमा का एनकाउंटर।
- फरवरी 2026: सर्वोच्च नेता देवजी और संग्राम का सरेंडर।
'नक्सल-मुक्त भारत' के संकल्प की ओर
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद के पूर्ण सफाए का लक्ष्य रखा है। देवजी और उनकी टीम द्वारा AK-47 और INSAS राइफलें पुलिस को सौंपना इस बात का प्रमाण है कि अब नक्सली विचारधारा और सैन्य शक्ति दोनों ढलान पर हैं। जानकारों का मानना है कि टॉप लीडरशिप के खत्म होने के बाद अब यह संगठन केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएगा।
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