लोकसभा में शिवसेना सांसदों के विलय का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, उद्धव ठाकरे गुट ने स्पीकर के फैसले को दी चुनौती
नई दिल्ली: लोकसभा अध्यक्ष (Loksabha Speaker) ओम बिरला (Om Birla) द्वारा शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) (UBT) के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) के नेतृत्व वाली शिवसेना (Shivsena) में विलय को मंजूरी दिए जाने के बाद यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। शिवसेना (यूबीटी) ने मंगलवार को सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में याचिका दायर कर लोकसभा अध्यक्ष के फैसले को चुनौती दी है।
तत्काल सुनवाई की मांग
शिवसेना (यूबीटी) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ से मामले की जल्द सुनवाई की मांग की। उन्होंने अदालत से कहा कि संसद में पार्टी का कामकाज पूरी तरह प्रभावित हो गया है, क्योंकि उसके छह सांसद अब उसके साथ नहीं हैं और लोकसभा अध्यक्ष ने उनके दूसरे दल में विलय को मान्यता दे दी है। इस पर अदालत ने कहा कि वह मामले पर विचार करेगी, लेकिन तत्काल सुनवाई का आश्वासन नहीं दिया जा सकता।
छह सांसदों के विलय को मिली थी मंजूरी
लोकसभा के मानसून सत्र से पहले स्पीकर ओम बिरला ने शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों संजय देशमुख (यवतमाल), संजय जाधव (परभणी), संजय दिना पाटिल (मुंबई उत्तर-पूर्व), नागेश पाटिल-अष्टीकर (हिंगोली), ओमप्रकाश राजेनिंबाळकर (धाराशिव) और भाऊसाहेब वाकचौरे (शिर्डी)—के एकनाथ शिंदे की शिवसेना में विलय को मंजूरी दी थी। इस फैसले के बाद लोकसभा में शिंदे गुट के सांसदों की संख्या बढ़कर 13 हो गई है, जबकि उद्धव ठाकरे गुट के पास अब केवल तीन सांसद बचे हैं।
अरविंद सावंत ने उठाए सवाल
शिवसेना (यूबीटी) के सांसद अरविंद सावंत ने लोकसभा अध्यक्ष के फैसले पर कड़ा विरोध जताया है। उन्होंने कहा कि स्पीकर ने सांसदों को **'Affiliation' (संलग्नता)** के आधार पर मान्यता दी है, जबकि संविधान या दल-बदल कानून में इस शब्द का कोई उल्लेख नहीं है। सावंत ने सवाल उठाया कि यदि कानून में 'Affiliation' शब्द मौजूद ही नहीं है, तो फिर स्पीकर ने किस संवैधानिक प्रावधान के तहत यह फैसला लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि संविधान की भावना और दल-बदल विरोधी कानून की अनदेखी की गई है।
दसवीं अनुसूची को लेकर विवाद
शिवसेना (यूबीटी) का कहना है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत केवल विधायी दल के दो-तिहाई सदस्यों के अलग होने से किसी दूसरे दल में विलय स्वतः वैध नहीं हो जाता। पार्टी का दावा है कि वैध विलय तभी माना जा सकता है, जब मूल राजनीतिक दल का ही दूसरे दल में विलय हो। ऐसे में छह सांसदों के शिंदे गुट में विलय को मंजूरी देना कानून के अनुरूप नहीं है। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला राजनीतिक और कानूनी दोनों दृष्टि से अहम माना जा रहा है। संसद के मानसून सत्र के दौरान इस विवाद पर पूरे देश की नजर बनी हुई है।
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