आधी रात को गूंजीं घुंगरू की आवाजें... और चीखते-चिल्लाते हॉस्टल छोड़ भागीं 300 लड़कियां! मेळघाट के घने जंगलों में बसी आश्रमशाला का वो सच जिसने सरकार को हिला दिया
अमरावती: कालकोठरी सा सन्नाटा... घने जंगलों के बीच बसी एक इमारत... और अचानक आधी रात को सन्नाटे को चीरती हुई छन-छन घुंगरू की आवाजें! अमरावती जिले के खौफनाक मेळघाट के जंगलों में स्थित 'डोमा आदिवासी आश्रमशाला' में पिछले 8 दिनों से जो हो रहा है, उसे सुनकर किसी की भी रूह कांप जाए। कुछ दिन पहले ही यहां की हवाओं में जहर (विषबाधा) घुला था, लेकिन इस बार जो आफत आई है, वो किसी अनदेखे और अनजाने खौफ का साया बनकर आई है!
'कोई है जो हमें बुला रहा है...'
कहानी शुरू होती है ठीक 8 दिन पहले। हॉस्टल का माहौल एकदम शांत था। रात के करीब 12 बजे अचानक एक कमरे से एक लड़की के जोर-जोर से हंसने की आवाज आई। अधीक्षिका (Superintendent) उज्जवला इंगले जब दौड़ती हुई कमरे में पहुंचीं, तो मंजर देखकर उनके होश उड़ गए! एक नहीं, दो नहीं... बल्कि 15 से 16 छात्राएं एक साथ कभी पागलों की तरह अट्टाहास कर रही थीं, तो अगले ही पल फूट-फूटकर रोने लगती थीं।
"मैडम! वो देखिए... खिड़की के बाहर कोई खड़ा है! हमें घुंगरू की आवाजें आ रही हैं... वो हमें अपने पास बुला रहा है!" मासूम लड़कियों की आंखें खौफ से फटी हुई थीं और वे बुरी तरह कांप रही थीं। अधीक्षिका ने जैसे-तैसे उस रात मामले को संभाला और सुबह होते ही स्कूल के प्रिंसिपल चौधरी को इसकी खबर दी।
गांव में फैला खौफ: 'शाप या भूतबाधा?'
खबर जंगल की आग की तरह पास के गांवों में फैल गई। 'डोमा' से लेकर 'एकताई' गांव तक सिर्फ एक ही चर्चा थी, "आश्रमशाला पर किसी बुरी आत्मा का साया मंडरा रहा है!" दहशत का आलम यह हुआ कि देखते ही देखते हॉस्टल में चीख-पुकार मच गई। लड़कियां अपने बैग, किताबें और सामान छोड़कर बदहवास हालत में बाहर की तरफ भागीं। अभिभावक (Parents) दौड़ते हुए स्कूल पहुंचे और रोती-बिलखती अपनी बेटियों को खींचकर घर ले गए।
मात्र 24 घंटे के भीतर, 300 से ज्यादा लड़कियों से भरा हॉस्टल पूरी तरह वीरान और सन्नाटे में तब्दील हो गया! सबसे ज्यादा लड़कियां 'एकताई' गांव की थीं, जहां अब भी डर का माहौल है।
अदृश्य साया या खौफनाक वहम? सच आया सामने!
जब यह खबर मुंबई तक पहुंची, तो प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए। आनन-फानन में स्वास्थ्य विभाग की टीमें और 'अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति' की तेजतर्रार अधिकारी नंदिनी जाधव व डॉ. देशमुख मुंबई से सीधे मेळघाट के घने जंगलों में पहुंचे। डॉक्टरों की टीम ने जब जांच शुरू की, तो इस खौफनाक कहानी का वो सच सामने आया, जिसे जानकर हर कोई हैरान रह गया!
क्या है इस 'साये' की असलियत?
डॉक्टरों के मुताबिक, यह कोई 'भूत-प्रेत' या 'आत्मा का साया' नहीं है, बल्कि एक बेहद दुर्लभ और जटिल मानसिक स्थिति है—जिसे विज्ञान की भाषा में 'मास हिस्टीरिया' (Mass Hysteria) कहा जाता है।
डॉक्टरों का क्या कहना है कि, "जब कोई एक इंसान अत्यधिक मानसिक तनाव या डर के कारण अजीब हरकतें करने लगता है, तो उसे देखकर आसपास के बाकी लोग (विशेषकर एक साथ रहने वाली लड़कियां) भी अनजाने में उसी डर को सच मानने लगती हैं। उनका दिमाग उन्हें वो आवाजें और साए दिखाने लगता है जो असल में होते ही नहीं!
अब क्या हो रहा है डोमा आश्रमशाला में?
फिलहाल मेळघाट के उस वीरान हॉस्टल में मुंबई से आए एक्सपर्ट्स, डॉक्टर्स और प्रिंसिपल चौधरी डटे हुए हैं। गांव-गांव जाकर लड़कियों और उनके डरे हुए मां-बाप की 'काउंसलिंग' की जा रही है। उन्हें समझाया जा रहा है कि यह दिमाग का एक वहम है, कोई भूतबाधा नहीं। लेकिन सवाल अब भी वही है, क्या डॉक्टर और अंनिस की टीम इन 300 बच्चियों के दिल से उस खौफनाक रात की खौफनाक यादों को मिटा पाएगी? क्या वो वीरान पड़ी आश्रमशाला फिर से खिलखिला उठेगी?
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