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दीपाली चव्हाण आत्महत्या प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, वन अधिकारी विनोद शिवकुमार को राहत; जाने क्या बोली अदालत


अमरावती: अमरावती जिले के मेळघाट व्याघ्र प्रकल्प की वनपरिक्षेत्र अधिकारी दीपाली चव्हाण आत्महत्या प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन उपवनसंरक्षक विनोद शिवकुमार को बड़ी राहत दी है। सर्वोच्च न्यायालय ने उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्रवाई को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि केवल वरिष्ठ अधिकारी का कठोर व्यवहार, काम को लेकर फटकार, प्रशासनिक कार्रवाई या प्रतिकूल टिप्पणी अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

क्या था पूरा मामला?

दीपाली चव्हाण ने 25 मार्च 2021 को हरिसाल स्थित अपने सरकारी आवास में आत्महत्या कर ली थी। घटना के बाद सामने आए उनके पत्रों में तत्कालीन उपवनसंरक्षक विनोद शिवकुमार पर गंभीर आरोप लगाए गए थे। आरोपों में बार-बार फटकार लगाने, निलंबन की धमकी देने, छुट्टी के आवेदन अस्वीकार करने और कथित मानसिक प्रताड़ना सहित कई बातें शामिल थीं।

मामले में शिवकुमार के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 306, 504 और 506 के तहत मामला दर्ज किया गया था। पुलिस जांच के बाद आरोपपत्र भी दाखिल किया गया। निचली अदालत और बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ से राहत नहीं मिलने के बाद शिवकुमार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति नोंगमईकापम कोटिस्वर सिंह की पीठ ने कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध साबित करने के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उकसावे, आत्महत्या के साथ निकट संबंध और आरोपी की स्पष्ट आपराधिक मंशा का होना जरूरी है।

अदालत ने यह भी माना कि जिन घटनाओं का उल्लेख मामले में किया गया, उनमें से कुछ आत्महत्या से कई महीने पहले की थीं। ऐसे में आत्महत्या के ठीक पहले आरोपी की ओर से उसे उकसाने वाली कोई ऐसी ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई, जिससे धारा 306 के तहत मुकदमा चलाया जा सके।

‘कठोर प्रशासनिक व्यवहार’ मात्र से नहीं बनता अपराध

सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी वरिष्ठ अधिकारी द्वारा काम को लेकर सख्ती बरतना, फटकार लगाना, प्रतिकूल टिप्पणी करना या अनुशासनात्मक कार्रवाई करना कर्मचारी को अप्रिय लग सकता है, लेकिन केवल इसी आधार पर आत्महत्या के लिए उकसाने का आपराधिक मामला कायम नहीं किया जा सकता। इसके लिए आरोपी की आपराधिक मंशा और आत्महत्या के लिए उकसावे का ठोस आधार जरूरी है।

अदालत ने माना कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर शिवकुमार के खिलाफ मुकदमा आगे बढ़ाना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसके साथ ही उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई रद्द कर दी गई और उन्हें इस मामले में राहत मिल गई।

साढ़े पांच साल बाद आया फैसला

दीपाली चव्हाण की मौत के करीब साढ़े पांच साल बाद आए इस फैसले ने एक बार फिर इस चर्चित मामले को सुर्खियों में ला दिया है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला जहां आरोपी अधिकारी के लिए बड़ी राहत है, वहीं दीपाली चव्हाण द्वारा लगाए गए आरोपों और इस पूरे प्रकरण की पृष्ठभूमि को लेकर भी चर्चा जारी है।

(यह खबर उपलब्ध न्यायालयीन रिपोर्टों और प्रकाशित समाचार विवरणों के आधार पर तैयार की गई है।)