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Nagpur

MK Stalin के घर में 'महाभारत': सत्ता की दहलीज पर आकर भी क्यों नहीं झुके स्टालिन? बाप-बुआ बनाम बेटा-दामाद की पूरी इनसाइड स्टोरी


चेन्नई: तमिलनाडु की राजनीति में चुनाव नतीजों के बाद आए भूचाल ने अब एक नया मोड़ ले लिया है। यह लड़ाई अब सिर्फ दो पार्टियों के बीच नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री आवास के भीतर ‘अपनों’ के बीच सिमट गई है। सूत्रों की मानें तो डीएमके (DMK) प्रमुख एमके स्टालिन के परिवार में गठबंधन और सत्ता को लेकर दो फाड़ हो चुके हैं। एक तरफ जहां स्टालिन और उनकी बहन कनिमोझी अपने सिद्धांतों पर अडिग हैं, वहीं दूसरी तरफ उनकी पत्नी, बेटा और दामाद सत्ता के समीकरण साधने में जुटे थे।

परिवार में घमासान: सत्ता या सिद्धांत?

नतीजों के बाद तमिलनाडु की राजनीति में हलचल तब तेज हुई जब विजय (Thalapathy Vijay) को सत्ता से दूर रखने के लिए DMK और AIADMK के बीच गठबंधन की चर्चाएं शुरू हुईं। घर के भीतर ही दो गुट बन गए:

  1. गुट नंबर 1 (सत्ता समर्थक): स्टालिन की पत्नी दुर्गा स्टालिन, बेटे उदयनिधि स्टालिन और दामाद वी. सबरीसन। इनका तर्क था कि किसी भी कीमत पर विजय को रोकना जरूरी है, भले ही इसके लिए धुर विरोधी AIADMK से हाथ मिलाना पड़े।
  2.  गुट नंबर 2 (सिद्धांत समर्थक): खुद एमके स्टालिन और उनकी बहन कनिमोझी। स्टालिन का साफ मानना था कि विचारधारा से समझौता करना पार्टी के भविष्य के लिए घातक होगा।


ढाई-ढाई साल के मुख्यमंत्री का 'गुप्त फॉर्मूला'

अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, परिवार के दबाव में एक समय ऐसा आया जब एक लिखित फॉर्मूला तक तैयार कर लिया गया था। इस फॉर्मूले के तहत AIADMK और DMK के गठबंधन वाली सरकार बननी थी, जिसमें ढाई साल उदयनिधि स्टालिन और ढाई साल एडप्पादी पलानीस्वामी (EPS) मुख्यमंत्री रहते। लेकिन जब यह प्रस्ताव स्टालिन के पास पहुंचा, तो उन्होंने इसे सिरे से खारिज कर दिया। भारी पारिवारिक दबाव के बावजूद स्टालिन टस से मस नहीं हुए।

'हम जनता के फैसले को नमन करते हैं'-स्टालिन 

तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए एमके स्टालिन ने स्पष्ट कर दिया कि DMK एक सिद्धांतवादी पार्टी है। उन्होंने कहा, "जीत-हार से ज्यादा हमारे लिए पार्टी के आदर्श महत्वपूर्ण हैं। हम जनता के फैसले को नमन करते हैं और उसे स्वीकार करते हैं। हम एक मजबूत और प्रभावी विपक्ष की भूमिका निभाएंगे।"

स्टालिन ने नई सरकार को शुभकामना देते हुए यह भी साफ कर दिया कि DMK अगले छह महीने तक विजय सरकार के कामकाज पर पैनी नजर रखेगी, बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के।

EPS को सता रहा है टूट का डर

दूसरी तरफ, AIADMK के खेमे में भी बेचैनी कम नहीं है। ईपीएस (EPS) ने गठबंधन की खबरों को हवा तो दी, लेकिन उनके मन में एक बड़ा डर समाया हुआ है। उन्हें अंदेशा है कि अगर सरकार बनाने का कोई ठोस रास्ता नहीं निकला, तो उनके विधायक पाला बदलकर विजय के पाले में जा सकते हैं।

राजनीतिक गलियारों में चर्चा

तमिलनाडु की जनता अब स्टालिन के इस कदम को उनके राजनीतिक करियर का सबसे साहसी फैसला मान रही है। जहां एक ओर परिवार सत्ता के लिए समझौता करने को तैयार था, वहीं स्टालिन ने 'विपक्ष' में बैठना स्वीकार किया। अब देखना यह होगा कि उदयनिधि और सबरीसन की नाराजगी पार्टी के भीतर क्या रंग लाती है और विजय की नई सरकार स्टालिन की 'छह महीने की निगरानी' पर कैसे खरी उतरती है।